संभाजी महाराज(संपूर्ण जीवन) | Sambhaji Maharaj History in Hindi

sambhaji maharaj

छत्रपती संभाजी महाराज (sambhaji maharaj)या शंभुराजे(संभाजी राजे भोसले) छत्रपती शिवाजी के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। छत्रपती शिवाजी के बाद संभाजी छत्रपती बने और मराठा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में लिया । मराठों का सबसे बड़ा शत्रु मुंगल शासक औरंगजेब था । संभाजी ने औरंगजेब की कई सैनिक टुकड़ियों को कई बार युद्ध में हराया था । संभाजी महाराज अपनी वीरता और शौर्यता के लिए प्रसिद्ध थे ।

संभाजी ने अपने शासन काल में 210 युद्ध किए और एक भी युद्ध नहीं हारे थे । उनकी इस वीरता के कारण को कई बार हार का सामना करना पड़ा था । और उसने कसम खाई थी की जब तक छत्रपती संभाजी पकड़ा नहीं जाएगा तब तक वो अपना किमोंश सर पर नहीं चढ़ाएँगे । कुछ समय के बाद संभाजी को धोके से पकड़ लिया जाता है । वे एक सच्चे हिन्दू योद्धा थे । औरंगजेब के द्वारा दिये गए कई अकल्पनीय अत्याचार का सामना किया पर इस्लाम धर्म नहीं अपनाया और 11 मार्च 1689 को उनकी हत्या कर दी गई ।

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Sambhaji Maharaj, संभाजी महाराज का जन्म

छत्रपती संभाजी महाराज(sambhaji maharaj) का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था । इनके पिता का नाम छत्रपती शिवाजी महाराज तथा माता का नाम रानी साई बाई था । इनकी पत्नी का नाम रानी  येसुबाई और इनके पुत्र का नाम साहू तथा भवानी बाई था । इनका राज्यभिषेक 16 जनवरी 1681 में हुआ था ।

जीवन परिचय

छत्रपती संभाजी महाराज 9 वर्ष की उम्र में अपने पिता शिवाजी महाराज के साथ औरंगजेब से भेंट के लिए गए थे । पर औरंगजेब के द्वारा शिवाजी महाराज को उचित सम्मान नहीं दिया गया, और इस पर शिवाजी को अपमानित होना पड़ा इस पर शिवाजी ने औरंगजेब को उसी के सभा में उसकी तीखी आलोचना की । इस पर औरंगजेब क्रोधित होकर उसे कैद कर नजर बंद कर दिया गया तथा उन्हें वहीं मारने का षड्यंत्र रचने लगे । पर शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी वहाँ से निकलने में सफल हो गए और दक्षिण लौट गए ।

उन्होने केवल 14 साल के उम्र में 3 संस्कृत ग्रंथ लिखे थे –

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  1. नखशिख
  2. बुधभूषण
  3. नायीकाभेद और सातशातक
संभाजी महाराज
संभाजी महाराज

 

जिस प्रकार सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है शंभूराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हष्ट पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार संभालने के लिए कहा था। शंभू राजे ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से 4 वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक संभाला कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर को सभाला था।

आगे अथड़ी, रायबाग से गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोड़ा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवानों से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आए थे। शंभू राजा के इस वीरता से बालाजी पंत प्रभावित हुए थे.

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