संभाजी महाराज(संपूर्ण जीवन) | Sambhaji Maharaj History in Hindi

sambhaji maharaj

छत्रपती संभाजी महाराज (sambhaji maharaj)या शंभुराजे(संभाजी राजे भोसले) छत्रपती शिवाजी के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। छत्रपती शिवाजी के बाद संभाजी छत्रपती बने और मराठा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में लिया । मराठों का सबसे बड़ा शत्रु मुंगल शासक औरंगजेब था । संभाजी ने औरंगजेब की कई सैनिक टुकड़ियों को कई बार युद्ध में हराया था । संभाजी महाराज अपनी वीरता और शौर्यता के लिए प्रसिद्ध थे ।

संभाजी ने अपने शासन काल में 210 युद्ध किए और एक भी युद्ध नहीं हारे थे । उनकी इस वीरता के कारण को कई बार हार का सामना करना पड़ा था । और उसने कसम खाई थी की जब तक छत्रपती संभाजी पकड़ा नहीं जाएगा तब तक वो अपना किमोंश सर पर नहीं चढ़ाएँगे । कुछ समय के बाद संभाजी को धोके से पकड़ लिया जाता है । वे एक सच्चे हिन्दू योद्धा थे । औरंगजेब के द्वारा दिये गए कई अकल्पनीय अत्याचार का सामना किया पर इस्लाम धर्म नहीं अपनाया और 11 मार्च 1689 को उनकी हत्या कर दी गई ।

Sambhaji Maharaj, संभाजी महाराज का जन्म

छत्रपती संभाजी महाराज(sambhaji maharaj) का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था । इनके पिता का नाम छत्रपती शिवाजी महाराज तथा माता का नाम रानी साई बाई था । इनकी पत्नी का नाम रानी  येसुबाई और इनके पुत्र का नाम साहू तथा भवानी बाई था । इनका राज्यभिषेक 16 जनवरी 1681 में हुआ था ।

जीवन परिचय

छत्रपती संभाजी महाराज 9 वर्ष की उम्र में अपने पिता शिवाजी महाराज के साथ औरंगजेब से भेंट के लिए गए थे । पर औरंगजेब के द्वारा शिवाजी महाराज को उचित सम्मान नहीं दिया गया, और इस पर शिवाजी को अपमानित होना पड़ा इस पर शिवाजी ने औरंगजेब को उसी के सभा में उसकी तीखी आलोचना की । इस पर औरंगजेब क्रोधित होकर उसे कैद कर नजर बंद कर दिया गया तथा उन्हें वहीं मारने का षड्यंत्र रचने लगे । पर शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी वहाँ से निकलने में सफल हो गए और दक्षिण लौट गए ।

उन्होने केवल 14 साल के उम्र में 3 संस्कृत ग्रंथ लिखे थे –

  1. नखशिख
  2. बुधभूषण
  3. नायीकाभेद और सातशातक
संभाजी महाराज
संभाजी महाराज

 

जिस प्रकार सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है शंभूराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हष्ट पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार संभालने के लिए कहा था। शंभू राजे ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से 4 वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक संभाला कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर को सभाला था।

आगे अथड़ी, रायबाग से गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोड़ा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवानों से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आए थे। शंभू राजा के इस वीरता से बालाजी पंत प्रभावित हुए थे.

संभाजी का मुगलों के साथ मिलना

संभाजी(शंभू राजा) ने मुगलों से मधुर भाव से मिलने और समय आने पर उन्हे पराजित करने की योजना बन रहे थे । और अपने खोये हुए सम्मान को फिर से प्राप्त करना चाहते थे ।

उस समय शंभू राजे को एक शाही पत्र मिला जिस पर औरंगजेब की मुहर लगी हुई थी । पत्र से पता चला की औरंगजेब का पुत्र शाहआलम दक्खन का सूबेदार बन कर आया है । शाहआलम के हस्ताक्षर और मुहर के साथ दिलेरखान ने शंभुराजे के पास भेजा था कि यदि शंभुराजे मुगलों से जाकर मिले तो उन्हें अभयदान दिया जाएगा। पत्र मिलने के बाद शंभुराजे मुगलों से हाथ मिलने का मन बना लिया था । परंतु उनकी पत्नी ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयत्न किया पर वो नहीं माने ।

मुगलों से मिलने से पहले शंभुराजे श्रंगारपुर के शिवमंदिर में महादेव का अभिषेक किया था । इसके बाद वो मुगलों से मिलने जा रहे थे उसी समय कवि कलश और कुछ मराठों ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया पर वो नहीं माने ।

शंभुराजे को लेने नदी के पार मुगल सेना पहले से आके  खड़ा हुआ था । हरे रंग के कुर्ते सलवार पहने, लम्बी लम्बी दाढ़ी मूँछ वालें मुगल शंभुराजे को मुग्ध भाव से देख रहे थे । युवराज के नदी में उतरते ही मुगल घुड़सवारों ने अपने हरे झंडे और अपनी तलवारों को हवा में लहराया । अल्लाहो अकबर और जय शंभुराजे के नारे लगाने लगे । ये सब देखकर खेलोजी का कलेजा काँप उठा । वे उन्हें रोकने के लिए कूद पड़े ।

शंभुराजे ने घोड़े पर से कृष्णा नदी का पानी हाथ मे लिया और बोले – खेलो बाबा कृष्णा माता कि सौगंध खाकर कहता हूँ , उचित समय आने पर आपको पता चल जाएगा कि संभाजी कौन हैं । सारी दुनिया को जीतकर आपके पास प्रणाम करने के लिए आऊँगा ।

खेलो जी बहुत हठी स्वभाव के थे और उन्हें मनाने लगे इसी बीच सांभा जी ने अपना घोडा दौड़ाया पर सामने खड़ी चट्टान होने के कारण घोडा नहीं चढ़ सका और घायल होकर गिर पड़ा और हड्डी टूटने के कारण वहीं मृत्यु भी हो गया । उन्हें भय हुआ कि नये रास्ते पर निकलने से पहले ये कैसा अपशकुन हुआ ।

संभाजी इसके बाद सोचने लगे कि परदेश में पराक्रम करेंगे , यश की माला पहनेंगे और फिर पिताजी का मंगल आशीर्वाद लेने के लिए स्वराज में वापस आ जाएंगे । दिलेरखान नामक सोने की मछ्ली के मुंह में बहदुरी से छलांग लगाने के अतिरिक्त अपने हाथ मे बचा क्या है ।

वाठार गाँव के पास दिलेरखान का सूबेदार और उसका भतीजा गैरत तीन हज़ार की सेना खड़े युवराज की राह देख रहे थे । दिलेरखान खान पागल की भांति इधर उधर घूम रहा था । उसने जान बूझकर सूबेदार को आगे भेजा था । उसका मराठा जाती पर बिलकुल भरोसा नहीं था ।

संभाजी को आते हुए देख उसे अपने आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था । संभाजी हाथी पर रौब से बैठे हुए थे । शिवाजी और संभाजी के चेहरे में बहुत समानता थी । दिलेरखान टकटकी लागए पागल की तरह देखता रहा ।

दिलेरखान ने स्वयं सीढ़ियों में चढ़कर कहा – आइये दक्खिन की शान, शेर संभाजी महाराज आइये । ऐसा कहते हुए उसने वही संभाजी को बाँहों में भर लिया ।

शंभुराजे के स्वागत के लिए शहनाई ढ़ोल, तासे बज़ रहे थे । एक शानदार जुलूस निकाला गया था । एकत्र हुई महिलाओं और बच्चों की भीड़ शिवाजी महाराज के पुत्र को बड़े ध्यान से देख रहे थे । इस प्रकार संभाजी का स्वागत सत्कार हुआ । पर शंभुराजे कुछ ठीक नहीं लग रहा था ।

दो दिनों के बाद दुर्गा बाई और राणु बाई संभाजी के पास पहुँच गई । राणु बाई संभाजी की दीदी थी । इस प्रकार शंभुराजे ने वहाँ तीन महीने बीता दिये । उन्हें पूरे महल में घूमने की आजादी नहीं थी और सैनिकों द्वारा उन पर नज़र रखा जा रहा था । पर उन्हें दिलेरखान के मनसूबे के बारे मे पता नहीं चल रहा था । दिलेरखान शंभुराजे से मीठी मीठी बाते करता और झूठी दोस्ती का नाटक करता था ।

औरंगजेब संभाजी राजे पर आसनी से भरोसा करने वाले नहीं थे । उसने उसका फायदा उठाने के लिए कहा और उसे अपनी फौज मे हमेशा आगे ढाल बनाकर हमेशा आगे रखने के लिए कहा । और दिलेरखान ने भूपालगढ़ पर हमले की तैयारी करने लगे पर संभाजी ने इस युद्ध में भाग लेने से मना कर दिया था । पर उन्हें अपनी सत्यनिष्ठा दिखाने के लिए युद्ध करना पड़ा ।

युद्ध में मराठों को हार का सामना करना पड़ा और 700 मराठों को बंदी बना लिया गया । संभाजी ने उन्हें केवल बंदी बनाने का आदेश दिया था । पर मुगलों ने आधे सैनिकों ने हाथ और आधे के पैर काट दिये थे ।

मराठों की इस स्थिति को देखकर संभाजी दिलेरखान पर बहुत क्रोधित हुए और उन्हें मुगलों के षड्यंत्र के बारे में ज्ञात हो गया । और वो वहाँ से निकलने के बारे में सोचने लगे । पर दिल्ली से फरमान आया था कि संभाजी को बंदी बना लिया जाय और 5000 सैनिक भी भेजे गए ।

पर रास्ते के एक नदी में स्नान के बहाने संभाजी ने 5 मराठे जो ब्राह्मण के भेष मे थे। उनके साथ वहाँ से निकल गए और दुर्गा बाई तथा राणू बाई(दीदी) को उनको वहीं छोड़ना पड़ा ।

गणोंजी के साथ युद्ध

गणोंजी जब मुगलों की सहायता कर रहे थे । तब उन्होने अपने और संभाजी के बीच हुए युद्ध के बारे में बताया था – संभाजी ने कलुशा को गणोंजी जी के ऊपर चढ़ाई करने के लिए भेजा था । पर उन्हें वहाँ से भागा दिया गया । पर कलुशा ने संभाजी को बुला लिया । उनके पास 5000 सैनिक थे और गणोंजी के पास 10000 की सेना थी ।

तब मुकर्रबखान ने पूंछा तुम्हारी सख्या तो दोगुनी थी ।

गणों जी ने कहा – कौन जाने इस भोसले की औलाद ने रणचंडिका को हि अपने वश मे कर लिया है । वह संभा जब हवा से बात करने वाले घोड़े पर बैठकर रण भूमि में उतरता है तो उसके शत्रु भी मंत्र मुग्ध होकर उसे देखने लगते है ।

उसकी केवल एक ललकार सैनिकों में बारह भैंसों की शक्ति भर देता है । खान साहब क्या बातये । बताने में भी शर्म आती है । सम्भा ने शिरकान में कदम रखा और हमारी सेना बड़ी मुश्किल से दो तीन घंटे टीक पायी । उसके बाद सभी जंगलों मे भाग निकले ।

संभाजी को कैद करना

छत्रपती शिवाजी की मृत्यु के बाद 22 – 23 की उम्र में संभाजी ने शासन सँभाला था । उनके छत्रपती बनते ही उन्होने औरंगजेब को परेशान कर रखा था । औरंगजेब 8 वर्षों से अपनी 5 लाख की सेना के साथ संभाजी को पकड़ने के लिए बहुत कोशिश किया पर पकड़ नहीं पाया था ।

इसके बाद औरंगजेब ने निर्णायक युद्ध के लिए महाराष्ट्र में आकर डेरा डाल दिया और संभाजी को पकड़ने के लिए आस पास के सभी जगह में अपनी सेना को  भेज दिया। उस समय मराठों की भी शक्ति बहुत थी ।

इधर मराठों ने भी औरंगजेब से आर पार की लड़ाई करने के लिए तैयार थे । संगमेश्वर मे संभाजी, सेनापति और कुछ विश्वास पात्र मंत्रियो के साथ आगे तीन वर्षों तक के लिए रणनीति तैयार कर लिए थे । संभाजी के पास इतनी शक्तिशाली सेना थी की आगे 50 वर्षों तक औरंगजेब का सामना किया जा सकता था ।

संगमेश्वर में सभी को सुर्यौदय के पहले वहाँ से निकालना था । रात में शंभुराजे थके हुए गहरी नीद में सो रहे थे । तभी येसुबाई को पानी में छापक से कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी । येसुबाई की आँख अचानक खुल गई । वे बिस्तर पर उठ के बैठ गई । येसुबाई का पसीना छूट रहा था । मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था ।

इतना भयानक स्वप्न जिंदगी में कभी नहीं देखा था । वो स्वपन की टूटी कड़ियों को जोड़ने का प्रयास कर रही थी । उन्होंने स्वप्न मे देखा था की वे भैयादूज के लिए सुंदर रंगोली सजाकर भाई के लिए चंदन की चौकी रखी है । पुजा की थाली और उपहार रखी थी ।

किन्तु चौकी की जगह पर उन्हें कोयले का ढेर दिखाई पड़ा । ऐसा कोयला जिन्हे अभी-अभी आग से निकालकर बुझाया गया हो । आरती की सोने की थाली के समीप दिखने वाला हाथ परिचित था । उस कलाई पर सर्पकार स्वर्ण कंगन गणों जी का था। आरती उतारने के बाद येसुबाई ने अपना सिर गणों जी के पैरों में रख दिया था । परंतु अपने भाई से मिले भयानक उपहार से वो थर थर काँप रही थी । भय से कलेजा मुह को आ रहा था ।

पुजा की थाली में वह उपहार – रेशम जैसे लंबे लंबे केश कलाप, ताज़े खून से चिपकी दाढ़ी, किसी शिल्पकृति की भांति अधखुली आँखें और थाली में गिरा हुआ खून । यह तो शंभू महाराज का है । येसुबाई ज़ोर से चिल्लाने को हुई । परंतु सामने गहरी नींद में सोये संभाजी महाराज को देखकर चिल्ला न पाई। उन्होंने पहले ही महाराज से यहाँ से जल्दी निकलने के लिए कहा था ।

रात की बैठक के बाद महाराज ने अपने सभी अधिकारियों से कहा की – जिनके लिए संभव हो वो तुरंत वहाँ से निकल जाये और शाम तक अपने निश्चित स्थान पर पहुँच जाये । उसी समय सेना की कुछ टुकड़ियाँ संगमेश्वर से निकल पड़ी । किन्तु संभाजी के पैर थम गए उन्होंने अजोर्जी यादव को सुनने का वचन दिया था ।

येसुबाई तत्काल निकलने का आग्रह कर रही थी । किन्तु येसु बाई ने संगमेश्वर के सूबेदार को आदेश दिया की चाहे कुछ भी हो जाये एकदम सुबह निकालना है । सुबह होते ही महाराज और येसुबाई ने स्नान करके पूजा की ।

सुबह महाराज उन यादवों को मिलने का वचन दिया था । येसुबाई ने उनसे जल्द ही वहाँ से निकलने के लिए कहा । पर महाराज ने प्रजा की बात सुनने के बाद निकलने का निर्णय लिया । येसुबाई की भीतरी घबराहट उन्हें शांति से उन्हें बैठने नहीं दे रहा था । आवेश में आकार वह बगल के खंभे पर हांथ रखकर रोने लगी ।

यह देख शंभू महाराज को बड़ा आश्चर्य हुआ । वे महारानी के समीप आए । जैसे कोई लता वृक्ष से लिपट जाती है येसुबाई ने उसी तरह शंभुराजे को बाँहों में भर लिया । महाराज येसुबाई के सिर पर हांथ फेरते हुए कहा – येसु आज तुम्हें क्या हो गया है । पूरे महाराष्ट्र को संभालने वाली हमारी महारानी आज एक सामान्य घरेलू औरत की तरह क्यों व्यवहार कर रही है ।

उन्होंने येसुबाई से कहा नाश्ते तक हम यहाँ का सारा काम खत्म करके हम यहाँ से निकलेंगे। पर महारानी ने साथ ही चलने को कहा पर वो नहीं माने । येसुबाई ने शंभुराजे के पैरों पर अपना सिर रखकर गर्म आंसुओं के फूल चढ़ाएँ । उनकी यह दशा देखकर शंभुराजे का मन भर आया ।

उन्होंने अपनी प्रिय महारानी को बड़े वात्सल्य से सीने से लगा लिया। राजा के उस आलिंगन से येसुबाई को अपने पिता पिलाजी राव का स्मरण हो गया । महाराज ने उन्हें 800 घुड़सवार के साथ वहाँ से सुर्यौदय से पहले निकलने को कहा ।

प्रातः काल होते ही दरबार की कार्यवाही आरंभ हुई । महाराज दो घंटे के लिए वहाँ रुकने वाले थे । यह जानने पर संताजी, धनाजी, कवि कलश और खंडों बल्लाल ने भी वहाँ रुकने का निश्चय किया । बगीचे में शंभुराजे के द्वारा न्यायदान का कार्य आरंभ हुआ । और इस कार्य में सुबह के नौ बजे थे । महाराज एक गरीब व्यक्ति की फरियाद सुन रहे थे ।

इतने में जैसे किसी के पेट में भाला घुस जाये और वह चीखने चिल्लाने लगे, दूर से आक्रमण का शोर सुनाई देने लगा । महाराज, महाराज, महाराज गज़ब हो गया । धोखा हो गया है । इस आवाज को सुनकर शंभुराजे धक्क से रह गए । बगल में रखी तलवार हांथ में लेकर खड़े हो गए ।

शंभुराजे ने तुरंत अपने घोड़े पाखरया को बुलाया और घोड़े पर बैठ गए इस वक्त सैनिकों की संख्या बहुत

कम हो गई थी बहुत से सैनिक रात मे ही निकल लिए थे और 800 घुड़सवार महारानी के साथ चले गए इस समय महाराज के पास केवल चार पाँच सौ घुड़सवार बचे हुए थे । इतने कम सैनिक में कैसे आत्मरक्षा किया जाय इसके लिए तुरंत योजना बना लिए ।

वृद्ध म्हालोजी घोडपड़े की आँखों से आग की लपटें निकलने लगा । इतने में सामने के हरे भरे पेड़ों के बीच सुनाई देने लगा , अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर दीन दीन पीछे से आते मुगलों के घोड़े सामने दिखाई देने लगे ।

इधर से घोडपड़े ने हर हर महादेव का नारा लगाया। इसके बाद संता जी और धनाजी ने जोरदार गर्जना की शिवाजी महाराज की जय, संभाजी महाराज की जय ।

घोड़े घोड़े से भीड़ गये । तलवारें बजने लगा । चौड़ी पीठ वाले एक उचे घोड़े पर मुकर्रबखान बैठा हुआ था । उसने चमड़े का कुर्ता पहन रखा था । उसने शंभू महाराज को देखा तो उसके शरीर में भयंकर जोश व्याप हो गया ।  संभाजी के पकड़े जाने के कल्पना मात्र से मुगलों में अपार जोश भर गया था ।

मुगलों के पास 1000 – 1200 घुड़सवार थे । सभी ने महाराज को चारों तरफ से घेर लिया था । किन्तु जब अपने प्राणों से प्रिय से प्रिय राजा की जान का खतरा उन्हें महसूस हुआ तो सभी मराठी सैनिक भड़क उठे । संता जी और खंडों बल्लाल तो आग बबूला हो गए । और कहा पकड़ों मारो कुचल दो जैसे शब्द युद्धभूमि में आग की तरह फैलने लगे ।

मुकर्रबखान ने महाराज पर पीछे से हमला किया पर इस वार को सेनापति म्हालोजी घोडपड़े ने अपने ऊपर ले लिया और मृत्यु को प्राप्त हो गए । इनके गिरते ही मराठे पूरी तरह भड़क उठे और एक सैनिक ने मुकर्रब खान के घोड़े पर हमला कर उसे गिरा दिया। और मराठे उस पर टूट पड़े ।

दोनों दल के सैनिकों में घमासान युद्ध हो रहा था । एक दूसरे के गर्दन तलवारें भांज रहे थे । सिर कट कट कर बगल में गिर रहे थे। लाल खून से पूरा बगीचा भर गया था ।

इसी समय दूर विश्राम कर रहे 50 – 60 मराठा सैनिक का दल हर हर महादेव की गर्जना करते हुए बड़े वेग से आये मुकर्रब खान उन्हें देखा और लगा की कोठी में अभी भी 1000 – 2000 मराठा सैनिक होंगे । उसने घोड़े पर चढ़कर देखा तो चारों तरफ पठानों और दक्खनी मुसलमानों के शव बिखरे पड़े थे । और उसने धीरे स्वर में कहा पीछे हटो । मुकर्रबखान लड़ाई छोड़कर पीछे हट गया । चारों तरफ शव पड़े हुए थे ।

अपने इलाके में शत्रु इतनी दूर तक कैसे चला आया । यह सोचकर शंभुराजे को बहुत बड़ा धक्का लगा । चारों ओर के रास्ते पर सेना तैनात है, हर चौकी पर पहरे लगे हुए है । समुन्द्र से लेकर थल तक कड़े पहरे लगे है फिर यह शत्रु इतने समीप कैसे आया यह सोचकर महाराज का कलेजा फटा जा रहा था । उन्हें लगा किसी धोखेबाज़ की उँगली पकड़कर ही शत्रु सेना यहाँ तक पहुँची है ।

अधिक विचार करने का समय नहीं था । कम से कम 350 मराठे मारे गए थे । महाराज के साथ केवल सौ मराठे बचे हुए थे । तभी गुप्तचर ने बताया कि महाराज 1000 – 2000 मुंगल तेज़ी से आ रहे है ।

तभी महाराज ने संताजी और खंडोवा को चिपलून कि तरफ भेज दिया । पर संताजी उन्हें अकेला छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थे । महाराज ने उनसे कहा आगे हमारी बड़ी चौकी है । रास्ते में येसुबाई और राजपरिवार कि अन्य स्त्रियाँ कि पालकियाँ है जाके उनकी रक्षा कीजिये ।

धनाजी को बचे हुए साथियों को लेकर हथखम्बा की ओर निकल जाने को कहा । पर सभी महाराज को अकेला छोड़ना नहीं चाहते थे । संभाजी ने कहा अगर सभी एक साथ पकड़े जाएँगे तो अनर्थ हो जाएगा । सभी को अलग अलग रस्तों से जाना होगा ।

संभाजी और कविकलश दोनों बड़े वेग से घोड़े दौड़ा रहे थे ।कवि कलश के हाथ मे गंभीर चोट लगा हुआ था । कविकलश घोड़ा दौड़ाते हुए विनती के स्वर में बोले – राजन आप आगे जाइए, अपनी जान बचाइए, राज्य बचाइए । मेरी चिंता न करें । मुझे यहीं पर रुकने दे

महाराज ने कहा – जो राजदरबार और शमशान में साथ देता है वही सच्चा बंधु होता है । आप चिंता न करें । महाराज ने नावड़ी में सरदेसाई के घर रुके और कवि कलश का तुरंत उपचार करने को कहा । महाराज ने अपने सभी राजश्री वस्त्र उतार दिये और वहाँ बैठे नाई से बिना देर किए अपनी दाढ़ी मूंछ कटवा लिए ।

तभी महाराज का घोड़ा आगे निकलकर नदी में पानी पीने लगा । तभी उसकी नज़र गडोंजी पर पड़ी और गडोंजी ने भी महाराज के घोड़े को पहचान लिया और उसने मुकर्रब खान को इशारा करते हुए बताया । देखते ही वह ईमानदार घोड़ा पीछे मुड़ा और कोठी की ओर तेज़ी से भागा और हिनहिनाते हुए महाराज को खतरे का संकेत दिया ।

महाराज समझ गए उनका कलेजा मुँह को आने लगा । उनको समझ में आ गया कि कोठी को घेरा जा रहा है । कवि कलश ने महाराज के पैरों में गिर पड़े और कलपते हुए कहने लगे – राजन आप यहाँ से निकल जाए नहीं तो बंदी बना लिए जाएँगे । कुछ भी करें पर यहाँ से निकल जाइए ।

संभाजी ने जैसे ही वहाँ से निकलने के लिए आगे बढ़े तो सामने देखा – जैसे बाढ़ का पानी अचानक चारों ओर फैल जाता है उसी तरह फौज ने उस इलाके को चारों तरफ से घेर लिया था । कर्णेश्वर मंदिर के सामने श्रंगारपुर के रास्ते , नावड़ी की ओर से , पीछे नदी के किनारे से घोड़े ही घोड़े आ रहे थे ।

मुसलमान और गणोजी शिर्के के साथ 1500 घुड़सवारों ने कोठी को चारों तरफ से घेर लिया था । नंगी तलवार लिए संभाजी ने अपना घोड़ा अपनी जगह पर ही वर्तुलाकार घुमाया । इतनी बड़ी फौज होने के बाद भी इस बलवान शेर को कैद करने का साहस किसी में नहीं था । दूर से ही रस्सी मे फसाने का प्रयत्न मुकर्र्बखान कर रहा था ।

इख़लासखान ने पीछे से अपनी तलवार का वार घोड़े की पुट्ठे पर किया । खून की धारा बहने लगी । घोड़ा ज़ोर से हिनहिनाया । इतने में 60 – 70 पठान महाराज पर एक साथ टूट पड़े । उनमें से एक ने भाले से जोरदार वार महाराज की जांघों पर किया । शंभुराजे को बहुत पीड़ा हुआ । उनके हाथों से तलवार गिर गया । वे खाली हाथ हो गए । शत्रुओं ने मौके का फायदा उठाया और महाराज को कैद कर लिया । यह दृश्य देखकर कृष्णा बाई ने पत्थर पर अपना सिर पटक दिया ।  

शंभूराजे को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे सपने की स्थिति में है या यथार्थ की। इखलास खान ने आगे बढ़कर हाथ-पांव बांधे शंभूराजा और कवि कलश के मुंह पर तमाचा मारा शंभूराजा को तमाचा लगाने से पहले ही कवि कलश ने इख़लास के मुंह पर जोर से थूक दिया।

इस पर अपनी कमर पर बंधा चाबुक इखलास ने बाहर निकाल लिया उसने शंभूराजा और कवि  कलस के सिर पर गालों पर वार किया मुड़े हुए उनके सिरों और गालों पर काले नीले निशान उभर आए दोनों को घोड़े पर बांधा गया उनके शरीर के कपड़े फाड़ दिए गए और उनकी जगह पर मुसलमानी ढंग के कपड़े पहनाए गए उनके चेहरों पर बहुत ही जख्म हो चुके थे इस कारण उन्हें सही रूप से पहचान पाना भी किसी के लिए असंभव था।

गणोंजी मुकर्रब खान को रास्ता दिखा रहे थे। गणोंजी ने कहा दिन रहते हमें इस पहाड़ी के  आगे निकलना है नहीं तो मधुमक्खियों के छत फूटने की तरह मराठे हमारी दुर्गति कर देंगे।

बिना देर किए 900 घोड़ों के साथ मुगलों की सेना शंभूराजे को लेकर तेजी से आगे बढ़ने लगी नायरी के पास शास्त्री नदी पर एक लकड़ी का पुल था। इसे शंभू राजा ने बनवाया था नदी को पार करके घोड़े तेज गति से दौड़ने लगे शंभू राजा की दुखी दृष्टि शास्त्री नदी का प्रवाह देखने लगी यह धारा उनकी प्यारी रानी येसु के मायके श्रृंगारपुर से नीचे की ओर आ रही थी। उनका स्मरण आते ही उनके आंखों से आंसू की चार बूंद टपक पड़ी।

अचानक दूर से घोड़ों के पैरों की आवाज आने लगी देखते ही देखते से 50-60 घोड़ों का जत्था दौड़ता हुआ सामने आ गया यह देखकर मुकर्रब हक्का-बक्का रह गया उन्हें लगा की पूरा जंगल घोड़ों से गिरा हुआ है गणोंजी ने आगे आकर कहां की यह दो हीरे के व्यापारी हैं जिन्हें हम पकड़ कर शंभू महाराज के पास लेकर जा रहे हैं ये सुनते ही सूर्या जी अपने सैनिकों के साथ पीछे हट गए और उन्हें जल्दी वहां से निकलने के लिए कहा।

अंतिम मराठा चौकी से निकलना

मालेघाट नजदीक आ रहा था यह मराठों का सबसे अंतिम चौकी था । इस बात का कवि कलश को पहले से ध्यान था । कविराज के मुँह पर लंबा – चौड़ा कपड़ा भरा था । मानो उस समय कवि राज के दांतों में बुद्धि आ गई थी । दांतों में ही सारी शक्ति केन्द्रित हो गई थी । कविराज ने धीरे धीरे पूरा कपड़ा कुतरना आरंभ कर दिया था ।

मालेघाट पहुँचने पर मराठे सिपाहियों की आवाज़े मुकर्रब खान को सुनाई देने लगा था । वह भयभीत हो गया था । मालेघाट से कराड़ ढाई घंटे का रास्ता था ।

कविकलश ने ध्यान से सुना । चौकी से आवाज़े आ रही थी । जैसे डूबते जहाज के पास यदि कोई लकड़ी का टुकड़ा दिख जाये तो डूबता हुआ व्यक्ति उस तैरते टुकड़े को पकड़ने के लिए छटपाटने लगता है, वही स्थिति कवि कलश की थी ।

मुँह में लगा हुआ कपड़ा निकल चुका था । उनके शरीर में जितनी शक्ति थी , उसे एकत्रित कर कवि कलश ने पूरी शक्ति से चिल्लाया, बचाओ , बचाओ मेरे शंभू राजा को बचाओं ।

कलश का यह चिल्लाना सुनते ही इखलासखान ने कवि कलश के सिर पर इतने ज़ोर से मारा कि कविराज के सिर से निकलने वाला खून का फ़ौवारा इख़लास के दाढ़ी तक पहुँच गया । कविराज बेहोस हो गए ।

नीचे से आवाज़ सुनकर ऊपर चौकी सजग हो गई । उसी समय गणों जी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई – संभाजी महाराज कि जय ।

चौकी के थानेदार ने सभी की बारीकी से जांच की । सामने गणों जी थे जो रायगढ़ के महारानी येसुबाई के बड़े भाई थे । थानेदार की नज़र उन दो सौदागरों पर भी गई । कवि कलश के सिर पर घाव के ताज़ा निशान थे । चक्कर आ जाने से उनकी गर्दन एक ओर झुक गई थी । शंभुराजे के शरीर पर मुसलमानी पहनावा था । दाढ़ी मूँछ सफाचट था । सिर और चेहरे पर खून के काले काले निशान थे । गणों जी ने दोनों के भौहें तक निकाल दिया था । इस स्थिति में उन्हें कोई पहचान भी नहीं पा रहा था ।

थानेदार ने पूछा आप महाराज से क्यों मिलने जा रहे है । इन सौदागरों को महाराज के चरणों में सौपना है । और कुछ मुंगल सैनिक भी औरंगजेब की सेना छोड़कर हमारे साथ आ रहे है । इसके बाद थानेदार ने उन्हें वहाँ से जल्द निकलने के लिए कहा ।

पाथरपुज गाँव

गणों जी और मुकर्रब खान पाथरपुज गाँव पहुँच गए । राह दिखाने वाले गड़ेरियों के लड़के बहुत प्रसन्न थे । सभी को सोने की तीन तीन मोहरें मिला था । इनमें पीरया और धक्लाया उम्र मे बड़े थे। इन लड़कों ने मोहरें के बदले में गणों जी को कराड़ तक का रास्ता दिखाया था ।

सोने के मुहर पाने की खुशी में उन्होने मुर्गा बनाने के लिए कहा था और खुशी से लड़के रास्ते में गोटियाँ खेल रहे थे । थोड़ी देर में पता चला की शंभुराजा को उनके सगे साले ने धोखा दिया है । महाराज को वो बैलो की तरह बांधकर औरंगजेब के पास ले गया । वह नीच गणों ने महाराज के साथ धोखा किया है । आज दोपहर को इसी रास्ते से गया है ।

ये बात सुनते ही बच्चों के चेहरे सफ़ेद पड़ गए । वे घबराकर एक दूसरे की ओर घबराकर देखने लगे । यह बात आग की तरह फैल गया। स्त्रियाँ और बच्चे रोने लगे । सभी को ऐसा लग रहा था मानो उनके घर का कोई गुजर गया ।

वे लड़के शोकमग्न हो गए । उन्होने इस कार्य मे अपने आप को दोषी मानने लगे । पीरया जामुन के ताने पर अपना सिर फटकने लगा । धक्लाया ने अपने ही गालों पर तमाचा मारने लगा और सभी ने स्वर्ण मुद्रा खेतों में फेंक दिया ।

और सभी एक दूसरे से लिपट कर रोने लगे । सभी ने भूंख प्यास भूल गये । वे 8 बालक खाई, पहाड़, झरने पार करते हुए कराड़ की दिशा में दौड़ने लगे । उनके पैरों में दस हांथियों का बल आ गया था । उनकी छाती धक धक कर रही थी। सीने में प्रतिशोध की भावना धधक रही थी । बिना रुके वे लड़के रात भर दौड़ते रहे ।

कराड़

कराड़ की मुगल छावनी गहरी नींद में सो रहा था। छावनी में केवल पहरेदार और चौकीदार जाग रहे थे । जगह जगह मशाले जल रही थी । वे सब धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे । एक पहरेदार ने पूंछा क्या रे कहाँ जा रहे हो ।

उन्होने कहा हमे गणों जी से मिलना है । एक सैनिक ने उन्हें पहचान लिया और गणों जी से मिलाने के लिए कहा । जैसे तंबू के पास पहुंचे उन्होने पहरेदार से मशाल छीना और आग लगा दिया । जो लोग बाहर से निकलते उनको डंडे से पीटने लगे । पर थोड़ी देर में सभी को बंदी बना लिया गया ।

आग लगने के कारण 3 लोग पूरी तरह जलकर मर गये थे । पर इनमें गणों जी नहीं थे उनको शक था इसलिए वे रात में वहाँ से निकलकर दूसरे स्थान में सोने चले गये थे ।

उन्हें पकड़कर बहुत पीटा गया था । अगले दिन सुबह होने पर मुकर्रब खान को इस घटना के बारे में पता चला तो उसने उन लड़कों को छोड़ दिया क्योकि उनके कारण ही उन्होने जंगल का रास्ता पार किया था ।

उन लड़कों के अंदर प्रतिशोध की आग उन्हें चैन की नींद लेने नहीं दे रहा था । उन्होने फिर से मुड़कर मुकर्रब खान और गणों जी को मारने के लिए दौड़े । उनके शरीर को प्रतिशोध के पंख लग गये थे । मुकर्रब के चारों ओर कड़ा पहरा था उसका अनुमान इन लड़कों को नहीं था ।

किन्तु इनके पहुँचते ही इन पर तलवारों के सपा सप वार हुए । खून की धारा बहने लगी । उस गर्म खून को देखकर मुकर्रब खान और गणों जी सन्न रह गये । इस आक्रमण से मुकर्रब हिल गया । और सभी भय भीत हो गये ।

इन आठों लड़को के शव को बोरे में भरकर बह रही कोयना नदी की धारा में फेंक दिया गया ।

इधर येसुबाई वशीषष्ठी नदी के तट पर महाराज का इंतजार कर रही थी । तभी कुछ मराठा घुड़सवार  सैनिकों ने संगमेश्वर में हुये आक्रमण के बारे में आकर बताया। संताजी भी कुछ देर के बाद महारानी के पास पहुंचे और कहा की महाराज ने हमें आपकी सुरक्षा के लिए भेजा है । महाराज दूसरे रास्ते से कविकलश के साथ रायगढ़ के लिए निकल गए है । पर महारानी बहुत भयभीत थी । और संता जी से कहा आप महाराज को अकेले छोड़ कर आए कैसे ।

शाम को दो घुड़सवार संगमेश्वर की ओर से भागते हुए आए और संता जी को महाराज को बंदी बनाए जाने की बात कही ।  संता जी संतप्त हो गए । पर इस खबर की पड़ताल करने के लिए संता जी 500 घुड़सवार की सेना के साथ चिपलून से संगमेश्वर की ओर चल पड़े ।

संगमेश्वर पहुँचने पर गाँव के लोगो से पता चला की शत्रु महाराज को बंदी बनाकर ले गए है । यह समाचार सुनते ही संता जी का चेहरा काला पद गया । वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगे तभी दूसरी दिशा से धनाजी पाँच घुड़सवार के साथ पहुंचे ।

धनाजी कई घंटों से महाराज को ढूंढ रहे थे पर कुछ ज्ञात नहीं हो पाया । दोनों ने आपस में विचार किया की गोवा और चिपलून का रास्ता छोड़ दिया जाये तो आंबाघाट का एकमात्र रास्ता बचाता है । दोनों की 1000 की घुड़सवार की सेना आंबा घाट की तरफ निकल पड़ी । यहाँ पहुँचने में 5-6 घंटे लगने वाले थे ।

आंबा घाट तक पहुँचने में शाम हो गई । यहाँ कवि कलश की 7000 घुड़सवार सैनिक देखकर संता जी और धना जी चकित रह गए । उन्होने कृष्णा जी से महाराज के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कविराज ने यहाँ से मुझे विशेष रूप से तैनात किया है ।

यहाँ से कोई शत्रु ना आया है और ना गया है । हम 7000 की सेना यहाँ चूड़ियाँ पहनकर थोड़ी न बैठे है शत्रु को हम यहाँ से कैसे जाने देते । तब वहाँ नरहरीपन्त पंत मिले उनसे पता चला कि, पाथरपुंज के जंगल में गणोंजी शिर्के मुंगल सैनिकों से साथ दो व्यक्ति जिनका पूरा शरीर रस्सियों और जंजीरों से बांध कर उन्हें घोड़े पर लाद कर ले जा रहे है ।

ये बात सुनने वालों के चेहरे पर प्रेत छाया सी फ़ेल गई । संताजी, धनाजी से लिपटकर रोना कलपना आरंभ कर दिया । सभी की आँखों में आँसू भर आए । उन्होने अपनी 7000 की सेना के साथ मुगलों पर आक्रमण के बारे में सोचा पर कराड़ वहाँ से दो तीन दिन का रास्ता था । और महारानी को देखना था । आंबाघाट पर दो हजार की सेना छोड़कर संताजी और धनाजी महारानी से विचार विमर्श के लिए निकल पड़े ।

शाम को महारानी तुलसी चौरे के पास बैठी थी । इसी समय तीन घुड़सवार आए और तीनों घुड़सवार महारानी के पैर पकड़कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगे और कहा – रानी सरकार हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा है । शत्रु महाराज को पकड़कर ले गये ।

येसुबाई ऐसे थरथराई मानो उन पर बिजली गिर गयी हो । और उन्हें चक्कर आ गया । यह बात चारों तरफ फैल गया महल में भीड़ जुटने लगा । इस भीड़ को महारानी ने किसी तरह शांत कराकर वापस भेज दिया । और महाराज को छुड़ाने के लिए सुबह ही निकलने का निर्णय लिया गया ।

मुकर्रब खान की स्थिति

किसी चोर उचक्के के हाथ अचानक कोहिनूर जैसा अनमोल हीरा लग जाये और उसकी रक्षा की चिंता में वह पूरी तरह घबरा जाये वह स्थिति मुकर्रब खान की हो रही थी । शंभू महाराज जैसा अकल्पित शिकार उसके हांथ लग गया था । उसका केवल एक लक्षय था । जल्द से जल्द संभाजी को औरंगजेब के पास पहोंचाना था। उसने दो दिन में ही 30 हज़ार की मुंगल सेना तैयार कर लिया ।

महाराज को लेकर वह कराड़ से निकल गया । मराठों के राजा को शत्रु लेकर जा रहा है , शंभू महाराज को जिंदा पकड़ लिया है । येसी चीख पुकार गावों वनों जंगलों में सुनाई पड़ने लगी । प्रजा मे शिवाजी और संभाजी का स्थान देवता का था । स्त्रियाँ और बच्चे ज़ोर ज़ोर से रोने कलपने लगे । तलवारें निकालकर गाँव वाले महाराज को छुड़ाने के लिए तैयार हुए पर लंबे अकाल के कारण उनके पास घोड़े भी नहीं थे ।

माथे पर धूप चिल्ल चिल्ला रहा था । लू की गर्मी सहन नहीं हो पा रही थी । गला सूखा जा रहा था । महाराज का मन ग्लानिग्रस्त हो रहा था ।

जागीरदार और जमींदार अंदर से बहुत से प्रसन्न थे । क्योंकि स्वराज्य आने से गढ़ियों और जमींदारों का वैभव नष्ट हो गया था । अन्नायी जागीरदारों के लिए हिंदवी स्वराज एक संकट था । इसलिए महाराज के कैद होने से वे बहुत खुस थे ।

इधर तीसरे दिन सुबह होते होते संताजी और धनाजी पाचाड़ पहुँच गये । महारानी 6000 के सेना लेकर आ रही थी । यहाँ से विचार विमर्श के बाद 8000 की सेना के साथ बहार निकलने का निश्चय किया गया ।

यहाँ हैबतराव ने आकर बताया की मुकर्रब परसों दोपहर में ही श्याम गाँव की घाटी छोड़ दी है और उसके साथ 25000 की सेना है । यह सुनकर महारानी घोड़े से उतरी, उनका गला भर आया । जैसे किसी व्यक्ति के कलेजे में कटार घुसजाने पर पीड़ा होता है वैसे ही पीड़ा महारानी को हो रहा था ।

इस सूचना के बाद महाराज को छुड़ाना असंभव था क्योंकि कराड़ के आगे पूरा क्षेत्र समतल था । यहाँ लड़ने का मराठों को अनुभव नहीं था ।

 

आगे का पोस्ट जल्द ही अपडेट किया जाएगा 

शिवाजी महाराज का संपूर्ण जीवन परिचय

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