सिंधु घाटी सभ्यता | Sindhu Ghati Sabhyata In Hindi

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज, Sindhu Ghati Sabhyata In Hindi

सिंधु घाटी सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता में से एक है। 1922 के पहले इस सभ्यता के बारे में किसी को कुछ मालूम नहीं था। 1922 में सवर्गीय राखालदास बनर्जी ने हड़प्पा  में एक बौद्ध  स्तूप की खुदाई करते समय उसके नीचे किसी प्राचीन नगर के अवशेष के बारे में ज्ञात हुआ। लगभग 400 मील की दूरी पर से भी इस सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए  है।

सिंधु घाटी सभ्यता
सिंधु घाटी सभ्यता

हड़प्पा  पंजाब में रावी नदी के तट पर और मोहनजोदड़ो  सिन्ध प्रदेश में सिन्धु नदीं के तट पर स्थित है। अब ये दोनों स्थान पाकिस्तान में हैं। इस सभ्यता के बारे में सबसे पहले सिंधु घाटी से ज्ञात हुआ इस कारण इसे सिंधु सभ्यता या सैन्धव सभ्यता कहा जाता है। हड़प्पा के नाम पर इसे हड़प्पा  सभ्यता भी कहा जाता है। यह एक बढ़े क्षेत्र में फैला हुआ था।

प्रारम्भ में इस सभ्यता पर सुमेर तथा ईरान की संस्कृतियों का प्रभाव माना जाता था। किन्तु बाद में भारतीय प्रदेश में ही कई ग्रामीण  संस्कृतियों का पता चला  जो इस सभ्यता से पहले की हैं और जिन्हें  सामान्य रूप से सिंधु -सभ्यता का स्रोत मानते हैं। इस सभ्यता के तत्त्व भारतीय सभ्यता के ही समान थी ।

इस प्रकार इस सभ्यता को भारतीय सभ्यता का प्राचीनतम चरण कहा जाने लगा लगा।  यह सभ्यता मिस्र, मैसोपोटामिया  सभ्यताओं के समान विकसित एवं प्राचीन थी तथा कुछ क्षेत्रों में तो उनसे भी अधिक  विशिष्ट थी ।

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार

सिंधु सभ्यता का  विस्तार  मुख्य रूप से हड़प्पा(हड़प्पा सभ्यता ) और मोहनजोदड़ो  में की गई  खुदाई पर आधारित है। इन स्थानों से इस सभ्यता की जानकारी मिलने के बाद  कई स्थानों पर इस सभ्यता के अवशेष ढूढ़े गए  जिनसे इसके व्यापक विस्तार का पता चलता है। और भारत देश के बटवारे के बाद हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के पाकिस्तान चले जाने के बाद भारतीय पुरातत्व ने कई स्थानों पर उत्खनन कार्य किए।

उत्तर-पश्चिम में इस सभ्यता के अवशेष बलूचिस्तान से प्राप्त हुए  है। उत्तर -पूर्व  में पंजाब प्रदेश में स्थित रूपड़  स्थान से इसके अवशेष मिले हैं। पूर्व में इस सभ्यता का विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर  तक मालूम पड़ता है।पश्चिम में मकरान समुद्र`तट पर सुत्कजेन्डोर तक  इस सभ्यता का केंद्र था था।

दक्षिण में इसका विस्तार नर्मदा घाटी तक और  गुजरात में लोथल तक  इस सभ्यता के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हु हैं। प्राचीन काल में राजस्थान में सरस्वती और दृषद्वती नामक नदियाँ बहती थी। यहाँ सिन्धु-सभ्यता का  अनुमान लगया जाता था। 

पुरातत्व विभाग

1950-51  में भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जनरल श्री घोंष ने यहाँ सिंधु -सभ्यता से सबंधित  पच्चीस स्थान खोजे। राजस्थान में प्रागैतिहासिक तथा पूर्वेतिहासिक काल के अनेक अवशेष मिलते हैं।

जहाँ तक सिन्धु सभ्यता का प्रश्न है इससे सबंधित  सरस्वती घाटी में पाकिस्तान की सीमा पर गंगानगर जिले के हनुमानगढ़ एवं सूरतगढ़  स्थानों के बीच में और दृषद्वती घाटी में बीकानेर तथा पूर्वी पंजाब की सीमा के नजदीक  हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष इन स्थानों के अतिरिक्त सोत्काकोह से भी प्राप्त होते हैं जिसकी खोज डेल्स ने1962 ई. में की थी । एन. जी. मजूमदार द्वारा चन्हुदड़ो की खोज 1931  ई. में की गई जो कि मोहनजोदडो से दक्षिण-पूर्व में लगभग 28 कि.मी. पर  है जहाँ से सिंन्धु-सभ्यता सबंधी  बर्तन, मनके, ताम्र उपकरण आदि प्राप्त हुए हैं। और यहाँ एक प्राचीन बौद्ध स्तूप भी पाया गया है ।

इन स्थानों में सबसे  महत्त्वपूर्ण काली बंगा है जहाँ से प्राप्त अवशेषों से इस सभ्यता के विषय में कई महत्त्वपूर्ण जानकारी  प्राप्त होती हैं। इस प्रकार विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में जितने बडे भूभाग पर सिंधु सभ्यता का विस्तार दिखाई पडता है उतने बडे भू भाग पर किसी भी अन्य प्राचीन विश्व संस्कृति का  विस्तार नहीं मिलता है ।

महत्वपूर्ण स्थानों से सिंधु सभ्यता के बारे में प्राप्त अवशेष 

सिन्ध

मोहनजोदड़ो के अतिरिक्त सिन्ध में कोटदीजी, चन्हूदड़ो ,अलीमुरीद  से सिन्धु-सभ्यताके अवशेष प्राप्त होते हैं।

बलूचिस्तान 

बलूचिस्तान  में सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष सोत्काकोह,सुत्कगेनडोर(1662 ई.में डेल्स ने यहाँ पर बंदरगाह , दुर्ग की खोक की थी।) एवं डाबरकोट से प्राप्त हुए है।

राजस्थान

राजस्थान में कालीबंगा स्थान पर सिंधु सभ्यता के अवशेष हुए हैं। यह सरस्वती नदी के किनारे स्थित है यहाँ पर पत्थर के मोती,मिट्टी की चूड़ियाँ , मिट्टी के बर्तन, स्नानागार, कुएँ, अग्निकुण्ड  प्राप्त हुए है।

पंजाब के रोपड़, बाड़ा, संधोल स्थानों पर उत्खनन  के दौरान सिंधु सभ्यता के मनके, चूड़ियाँ,बाली,मुद्रा अवशेष प्राप्त हुए।हरियाणा के बणावली एवं मित्ताथल,उत्तरप्रदेश के आलमगीरपुर और कौशाम्बी के निकट प्राप्त हुए है। गुजरात में रंगपुर,लोथल,रोजदि, सुरकोटड़ा एवं मालवण से सिंधु सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए है।

लोथल

लोथल में ऐसा माना  जाता है कि सिंधु सभ्यता के लोग पैदल और समुंद्री मार्गो से आये थे।  उत्खनन से ज्ञात होता है कि यहाँ पहले एक प्रसिद्ध बंदरगाह था तथा जहाजों के रुकने के लिए एक विशाल डाकयार्ड बना हुआ था। लोथल में नालियों की बहुत अच्छी व्यवस्था थी। लोथल में बाँट, चूड़ियाँ व पत्थर के आभूषण,लाल एवं काले रंग के बर्तन यहाँ प्राप्त हुए है।

 

इस सभ्यता का विस्तार  पूर्व से पश्चिम 1600 किलोमीटर व उत्तर से दक्षिण 1100 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था।

सिंधु घाटी सभ्यता तिथि

सिंधु सभ्यता की तिथि निर्धारित करने के लिए साहित्यिक एवं लिखित साक्ष्य  न होने के कारण  पूर्णरूप उत्खनन  से प्राप्त  साक्ष्यों पर आधारित  होना पडता है। और  इनका  अन्य देशों प्रमुखतया मैसोपोटामिया, ईरान  से संपर्क  था। सिंधु -सभ्यता में निर्मित वस्तुएँ भी इन स्थानों से प्राप्त हुई हैं।

के. एन.. शास्त्री तथा डा. राजबली पाण्डेय इसे. ईसा. पूर्व चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता मानते हैं। डा. पाण्डेय का मत है कि, यहाँ की खुदाई में जल के धरातल तक प्राचीन नगरों के खण्डहरों के एक के ऊपर दूसरे सात स्तर मिले  हैं।  यदि एक नगर के बसने, पनपने और उजडने के लिए 500 वर्ष का समय दिया जाए तो सात नगरों के बसने, विकसित होने और गिरने में लगभग 3500 वर्ष लगे होंगे। सबसे नीचे का स्तर भी सभ्य नगर का अवशेष है। यदि भूगर्भ का पानी बीच में बाधा न डालता तो  सातवें स्तर के नीचे भी खण्डहरों  के स्तर मिल सकते हैं।

इस प्रकार सिंधु घाटी सभ्यता कम से कम ईसा पूर्व चार हजार वर्ष माना जाता है।बलूचिस्तान एवं मकरान में मिली पुरातात्विक वस्तुओं के आधार पर भी यह माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता का प्रारम्भ ई.पू. चार हजार पूर्व का है।धर्मपाल ने कार्बन-14 पद्धति से  सिन्धु सभ्यता का समय 2300-1750 ई. पू. माना है तथा व्हीलर के अनुसार  सिन्धु-सभ्यता का समय 2500-1500 ई. पू  का  है। तिथि मतभेद होने के बावजूद  यह विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक थी।

सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता 

कुछ विद्वानों  के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता आर्यजातीय थे किन्तु मार्शल ने इस मत का सबल खण्डन किया है और सैन्धव-सभ्यता तथा वैदिक युगीन आर्य-सभ्यता के बीच असमानताओं की ओर ध्यान दिलाया है।

कुछ अन्य विद्वान् इस सभ्यता को द्रविड जातीय सभ्यता मानते हैं। इनका कहना है कि द्रविड पाषाण पात्र आभूषण इत्यादि की सिन्धु प्रदेश से प्राप्त अवशेषों के साथ बहुत समानता दिखायी पडती है तथा इन पर प्राप्त कुछ चिन्ह भी सिन्धु-सभ्यता की लिपि के समान हैं। पर सैन्धव-सभ्यता की लिपि अभी तक पढी नही जा सकी है

इस सभ्यता से भारी संख्या में मुहरों की प्राप्ति हुई है। ये मुहरें सेलखरी पत्थर की बनी हुई हैं और कई आकारों की मिलती हैं। इन मुहरों पर कई प्रकार के चित्रों का अंकन मिलता है जिनका सामान्य स्वरूप धार्मिक जान पडता है। इन पर चित्राक्षर लिपि में कुछ लिखा हुआ मिलुता है। समय-समय पर कई  विद्वानों ने इस लिपि को पढ लेने का दावा किया है  किन्तु अभी तक इस विषय पर कोई मत  नहीं हो पाया है।

इस प्रदेश की जलंवायु भिन्न प्रकार की थी | कृषि के लिये भूमि बडी उर्वर थी और कृषि कार्य  के लिये जल का अभाव नही था। भवनों के निर्माण में व्यापक मात्रा में पकी ईटों का प्रयोग यह प्रदर्शित करता है कि उस  समय जलाने की लकड़ी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी। नगर योजना के अन्तर्गत बांधों और  नालियों की  व्यवस्था  भी थी । मुहरों पर चीता और घंडियाल आदि पशुओं का अंकन भी मिलता है। 

विदेशी सभ्यताओं के साथ संबंध

मेसोपोटैमियायी सभ्यता के उत्खननों से प्राप्त साक्ष्य में डिलमन, मागन तथा मेहुला तीन स्थानों के बारे मे जानकारी मिलती है। जिनके साथ वहाँ के लोगों के व्यपारिक सबंध थे। अधिकांश विद्वान मेलुहा को भारत मानते हैं।

व्यापारिक सम्बन्ध

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का तत्कालीन अन्य सभ्यताओं के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे। सुमेर और उर से मिली मुहरों एवं सैन्धव-सभ्यता की मुहरों में पर्याप्त समानता मिलती है। इन मुहरों पर भी सैन्धव सभ्यता की मुहरों पर झुके सींगो वाला बैल तथा एक सींग वाला पशु अंकित मिलता है। मोहनजोदड़ो से एलम तथा सुमेर की बनी मुद्रायें प्राप्त हुई है। तथा एक मुहर पर मनुष्य को एक बाघ से लड़ते हुए दिखाया गया है। मिश्र और सिन्ध की कुछ सामग्रियों में भी अनुरूपता मिलती हैं।

हाईज मोड नामक विद्वान् ने मेसोपोटैमिया की वर्तुलाकार मुहर की ओर ध्यान आकर्षित किया है जिस पर हाथी के सूंड वाले एक वृषभ का अंकन मिलता है। उनका मानना है कि यह अंकन किसी मेसोपोटैमियायी मुहर पर नहीं मिलता किन्तु मोहनजोदड़ो की कई मुहरों पर इसे पाया गया है। इन साक्ष्यों से यह पता चलता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों का इन सभ्यताओं के साथ व्यापारिक सबंध थे।

प्राचीन भारत का इतिहास  

सिन्धु घाटी सभ्यता की विशेषता

  • सिंधु सभ्यता के लोग प्रचुर मात्रा में ताम्बे और कांसे की बनी वस्तुओं का उपयोग करते थे ।इस प्रकार इस सभ्यता को प्रस्तर-धातुयुगीन सभ्यता कहा जाता है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता में बडे-बडे नगरों का अस्तित्व मिलता है ओर इसी तथ्य को ध्यान में रख कर कुछ विद्वानों ने सिंधु सभ्यता के युग को भारतीय सभ्यता की प्रथम नगरीय क्रांति का युग कहा है।
  • प्राप्त अवशेषों से यह स्पष्ट है कि इस सभ्यता के लोग समृद्ध और अपेक्षाकृत विलासितापूर्ण जीवन बिताते थे। कई बड़े  स्मारक-भवनों से उनके विकसित सार्वजनिक जीवन का संकेत-मिलता है। प्राप्त अवशेषों में अस्त्र शस्त्रों की संख्या काफी काम है जो संभवतः उनको शान्तिप्रियता की ओर संकेत करती है।
  • इस सभ्यता में नगर योजना के अन्तर्गत प्रत्येक नगर के पश्चिम  में गढी का भाग बना हुआ मिलता है। यह भाग मानव निर्मित ऊंचे चबूतरे पर बनाया जाता था। मोहनजोदड़ो में गडी का भाग 230 फीट लम्बा और 78 फीट चौड़ा तथा हङप्पा में 200  फीट लम्बा तथा और 150 फौट चौडा है। गढी में संभवतः मुख्य पुरोहित अथवा शासक का निवास होता था।
  • सुरक्षा की दृष्टि से गढी के चारों ओर खाई बनाने का प्रचलन था। इसके पूर्व में सामान्य भवन बने होते थे जिनका धरातल अपेक्षाकृत नीचा होता था।

सिंधु सभ्यता का नगर योजना 

नगर एक निश्चित पूर्व योजना के आधार पर बने हुए दिखाई पडते हैं। नगरों की सडकें सीधी हैं और एक दूसरे को समकोण पर काटती हैं जिससे सम्पूर्ण नगर कई खण्डों में विभक्त हो जाता है। सड़के पर्याप्त चौडी होती थीं  इनकी चौडाई 9 फीट से 34 फीट तक मिलती है और कभी-कभी ये आधे मील की लम्बाई तक मिली हैं।

इने सड़को के दोनों ओर लोगों के रहने के मकान बनाये जाते थे।सड़को के नीचे नालियाँ बनी होती थी जिनका संबंध मकानों से निकलने वाली छोटी नालियों के साथ था। सडको की नालियाँ एक से दो फीट तक गहरी मिलती हैं जो ईट अथवा पत्थर से ढंका होता था ।

यहाँ मकानों के दरवाजे मुख्य सडकों पर न खुलकर गलियों में खुलते थे। ऐसा या तो सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता था अथवा इस कारण कि दरवाजे के खुलने पर सडक से मकान का अंदरूनी भाग न दिखायी पडे | प्राप्त अवशेषों से यह भी प्रमाणित होता है कि रात में सडकों पर प्रकाश की व्यवस्था थी ।

भवन निर्माण 

  • भवनो के निर्माण में पकी ईटों का प्रयोग हुआ है। भवन निर्माण की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ विशिष्ट प्रकार की ईटों का भी निर्माण किया जाता था। कमरों के कोनों में अंग्रेजी के एल  अक्षर के आकार की ईटें लगाई जाती थी । गारे के लिये मिट्टी और चूने का प्रयोग होता था।
  • मकानों को ऊंचे चबूतरे पर बनाया जात था जिससे वर्षा और बाढ़ के पानी से सुरक्षा हो सके। मकान  एक और दो मंजिले होते थे। नीचे के भाग में कुआ और रसोई घर बना मिलता है। ऊपर जाने के लिये सीढियाँ बनी होती थी  इनकी चौंडाई कम मिलती है।
  • मकानों की योजना आंगन पर आधारित होती थी जिसके चारों ओर कमरे बने होते थे। छत पाटने के लिये मिट्टी और लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। प्रत्येक मकान में स्नानगृह भी होता था। स्नान गृहों को मकान के आगे बनाया जाता  था तकि इनमें गिरने वाला  पानी सड़क पर बनी नालियों में पहुँच सके।

सिंधु घाटी सभ्यता का सामाजिक जीवन

सिंधु नगर को देखने पर यह पता चलता है कि समाज मे कई प्रकार के व्यावसायिक वर्गों का अस्तित्व रहा होगा। ईट बनाने वाले, मकान बनाने वाले, राजगीर, बढ़ई, अनाज उत्पादन करने वाले किसान।

गार्डन चाइल्ड के अनुसार सैन्धव समाज कई वर्गों मे बंटा हुआ था और वर्ग विभाजन का आधार आर्थिक था। समाज मे पुजारियों का एक वर्ग था जो जिनके हाथों मे संभवतः शासन की बागडोर हुआ करता था। इस प्रकर समाज मे दासों का वर्ग भी दिखाई पड़ता है खुदाई मे प्राप्त कुछ बहुत छोटे मकानों मे श्रमिक या दास वर्ग के लोगों के रहने कि व्यवस्था थी।

मूर्तियाँ

सिंधु घाटी सभ्यता से भारी संख्या मे नारी मूर्तियाँ मिली है और क्रीट तथा अन्य भूमध्यसागरीय सभ्यताओं के अंतर्गत मातृ सतात्मक समाज पाया जाता है इसी आधार पर यह अनुमान किया जाता है की सैन्धव सभयता के लोगों मे मातृ सतात्मक परिवारों का प्रचलन था। कुछ विद्वान इस सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता मानते है। द्रविड़ सभ्यता के कुछ जन समूहों मे मातृ सतात्मक परिवार का प्रचलन मिलता है।

सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त मूर्तियों और मुहरों के अंकन से लोगों के रहन सहन का पता लगता है । वे वस्त्रों से परिचित थे जो कपास और उन से बनाये जाते थे । कुछ मूर्तियों मे पुरूषों को ऊपर शाल जैसा वस्त्र ओढ़े हुए दिखया गया है।

स्त्रियों के परिधान के विषय मे स्त्री मूर्तियों से पता चलता है । मातृ देवी की मूर्तियाँ ऊपर अनावृत है तथा नीचे घाघरा की तरह एक घेरेदार वस्त्र पहने हुए दिखाया गया है।

पुरूषों मे कुछ लोग दाढ़ी मूंछ रखते थे और कुछ लोग दाढ़ी मुछ नहीं रखते थे। उनमे केश सज्जा के कई प्रकार प्रचलित थे सामान्य रूप से सिर के बीचों बीच मांग निकाली जाती थी। स्त्रियों के मूर्तियों से भी उनमे प्रचलित केश सज्जा के कई प्रकार मिलते है

कांसे की बनी नर्तकी प्रतिमा मे कुंडलीकृत केश राशि को बायें कान तथा गर्दन के पिछले भाग से ऊपर से होते हुए दाहिनी ओर लटके हुए दिखाया गया है।

प्राप्त आभूषण 

खुदाई मे कई आभुषणों के कई निशान मिले है। स्त्री और पुरुष दोनों ही आभुषण धारण करते थे।आभुषणों को बनाने में सोना,चाँदी, तांबा, कांसा तथा हाँथी दांत और बहुमूल्य पत्थरों का उपयोग किया जाता था। खुदाई में आधे इंच चौड़े और 16 इंच लम्बे सोने के फीते मिले है जिनके दोनों सिरे पर छेद मिलता है। यह संभवतः पात के समान का आभुषण था जिसे हरियाणा प्रदेश की स्त्रियाँ आज भी पहनती है।

कानों में कर्ण फूल और कमर में मेखला या करधनी पहनी जाती थी। इस सभ्यता के लोग शिल्प कला में भी निपुड़ थे। खुदाई में सूरमादनियाँ और सलाइयाँ भी मिली है। घोंघे में लाल चूर्ण मिला है जिसका प्रयोग संभवतः गालों पर मलने के लिए किया जाता था।

सिंधु घाटी सभ्यता का शासन व्यवस्था

सैन्धव लिपि के न पढे जाने से उनके राजनीतिक संगठन के बारे  में कुछ भी कह सकना कठिन है। फिर भी प्राप्त अवशेषों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है । मोहनजोदड़ो और हड़प्पा दोनों ही स्थानों पर दुर्ग का भाग मिलता है जो सम्भवत: प्रमुख राज्याधिकारी का निवास स्थान होता था । कुछ विद्वानों की मान्यता है कि सिन्धु-सभ्यता का एक विशाल साम्राज्य था जिसमें विभिन्न प्रदेशों पर केन्द्र द्वारा नियुक्त अधिकारी शासन करते थे ।

सैन्धव-जन एक कुशल प्रशासन तंत्र के अन्तर्गत संगठित थे।बहुत कम संख्या में प्राप्त अस्त्र-शस्त्र से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी शान्ति प्रिय थे अत: उनका जीवन राजनीतिक दृष्टि से भी शान्तिपूर्ण था जिसके कारण तत्कालीन निवासियों का जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण था।

आर्थिक जीवन

सिंधु घाटी का मुख्य व्यवसाय 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग कृषि कार्य में पर्याप्त विकास कर चुके थे ।बड़े – बड़े अन्न-भण्डार तथा इस सभ्यता में विकसित नागरीय जीवन इस बात के प्रमाण हैं कि सैन्धव जन अधिक अन्न का उत्पादन करते थे । नगरों में विविध उद्योगो और शिल्पों में लगे हुए लोग दूसरों द्वारा उत्पादित अतिरिक्त अन पर निर्भरशील थे।

लोथल तथा रंगपुर मे मिट्टी के साथ धान की भूसी मिली है जिससे पता चलता है कि इन स्थानों  पर लोगों को चावल का भी ज्ञान था। इन्हे कपास तथा इससे बनने वाले वस्त्र का भी ज्ञान था। मोहनजोदड़ों से एक रजत पात्र से लिपटा हुआ वस्त्र का टुकड़ा मिला है जिसको देखने से यह स्पष्ट होता है कि सैन्धव जनों को ज्ञात कपास जंगली कपास न होकर कृषि से उत्पादित कपास था।

पशुपालन

यहाँ के लोग पशुपालन भी करते थे । प्राप्त हड्डियों तथा मुहरों पर अंकित अंकनों से उन पशुओं का ज्ञान होता है जिनसे इस सभ्यता के लोग परिचित थे । गाय, बैल, भैंस तथा भेड़ पाले जाने वाले पशु थे। इस समय तक उद्योगों और शिल्पों का विकास हो चुका था । वे मिट्टी के बर्तन बनाने की कला, गृह निर्माण कला तथा तांबे और कांसे से कई वस्तुओं को बनाने की कला मे निपुण थे ।

व्यापार

सिन्धु घाटी सभ्यता व्यापार प्रधान सभ्यता थी । और वे अपने क्षेत्र से बाहर के स्थानों के साथ व्यापार करते थे। जो वस्तुए उन्हे मूलतः अपने प्रदेश मे उपलब्ध नहीं थी उन्हे वो बाहर से मांगते थे । खुदाई मे बड़ी मात्रा मे सोने और चाँदी की वस्तुए मिली है। व्यापार में नावों और जहाजों का उपयोग किया जाता था। मुहरों पर जहाज का अंकन मिलता है तथा लोथल मे मिट्टी से बने जहाज का एक नमूना भी मिला है ।

धर्म(क्या सिंधु घाटी सभ्यता के लोग हिंदू थे)

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भगवान शिव को मानते थे । विद्वानों का मत है कि सिंधु सभ्यता और वैदिक सभयता मे पारस्परिक सबंध था जो आगे मिलकर भारतीय सभ्यता का जन्म हुआ उसमे वैदिक रुद्र और सिंधु घाटी सभ्यता मे पुजा जाने वाला देवता मिलकर एक हो गए। बाद के हिन्दू धर्म मे रुद्र और शिव को एक माने जाने लगा। शिव कि लिंग रूप मे भी पुजा करते थे। खुदाई मे लिंग के स्वरूप के पत्थरों की प्राप्ति हुई है ।

बाद के भारतीय धर्म मे विविध प्रकार के पशु, पक्षियों,वृक्षों की पुजा का विधान दिखाई पड़ता है। नाग पूजा, पीपल, अथवा तुलसी के पेड़ की पूजा करते थे जो आज भी प्रचलित है । और विभिन्न पशु देवताओं के वाहनों के रूप मे मिलते है।

यहाँ के लोग कुछ पशुओं, और वृक्षों को पवित्र मानते थे और उनकी पूजा करते थे । कई मुहरों पर एक सींग वाला वृषभ बना मिलता है । अनेक मुहरों पर पीपल के पेड़ और पत्तियाँ बनी मिलती है और कुछ पर वृक्ष देवता तथा वृक्ष देवी को प्रसन्न करने के लिए बली हेतु पशु को ले जाते हुए दिखाया गया हैं । उनमें संभवतः जल पूजा तथा नाग पूजा का भी प्रचलन था ।

अन्तिम संस्कार की विधियाँ

सिंधु घाटी सभ्यता के खुदाई में मिले अवशेषों से अन्तिम संस्कार की तीन विधियाँ प्राप्त होती हैं मृत्यु के पश्चात् पूरे  शरीर को जमीन में गाड़ दिया जाता था।

शव को पहले पशु-पक्षियों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था और फिर बची हुई हड्डियों को अन्य वस्नुओं के साथ दफना दिया जाता जाता  था ।

दाह के पश्चात् अवशेष को पहले एक छोटे पात्र में रखा जाता था और पुन: उसे एक-बड़े पात्र में रखकर जमीन में गाड़ दिया जाता था । मगर दाह संस्कार का महत्त्व ज्यादा था ।

सिन्धु घाटी सभ्यता (Sindhu ghati sabhyata)का विनाश

इतनी समृद्ध सभ्यता का विनाश कैसे हुआ। इस विषय पर कई अनुमान व्यक्त किए गए है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह सभ्यता सिन्धु नदी में बाढ आने के कारण सामाप्त हुई, जबकि कुछ अन्य विद्वान् इस सभ्यता का पतन आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में गिरावट आ जाने के कारण मानते हैं।

कुछ का मत है कि इनका पतन आर्यो के आक्रमण के कारण हुआ। तथा खुदाई में मिलने वाले कुछ नर कंकालों को देखकर ऐसा लगता है मानों वे आक्रमणकारी से डर कर भागते हुए मारें गए हों। और कुछ का मानना है कि सिंधु घाटी सभ्यता बाढ़ के कारण नष्ट हुआ होगा।

 

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