महाराणा प्रताप की मृत्यु कैसे हुई

महाराणा प्रताप की मृत्यु कैसे हुई

महाराणा प्रताप की मृत्यु से भारत का एक वीर पुत्र सदा-सदा के लिए चला गया । जिसने मरते दम तक अपना सिर किसी शत्रु के सामने नहीं झुकाया और राजपूतों के सम्मान को बनाए रखा।

महाराणा-प्रताप-की-मृत्यु

हल्दी घाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप का जीवन बहुत कष्टों से भरा हुआ था । इसके बाद कुछ ही दिनों में राणा प्रताप न नई सैन्य शक्ति तैयार कर कई मुग़ल सेनाओं का संहार किया और 32 दुर्गों को जीतकर अपने अधिकार में कर लिया। चित्तौड़, अजमेर और माण्डलगढ़ को छोड़ कर सम्पूर्ण मेवाड़ को महाराणा प्रताप ने जीत लिया था। प्रताप का पूरा जीवन युद्धों में बीत गया।

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प्रताप की मृत्यु का समय

महाराणा प्रताप का अब बुढ़ापा आ गया था । संपूर्ण जीवन युद्ध करके और भयानक कठिनाइयों का सामना करके जिस प्रकार राणा ने व्यतीत किया उसकी प्रशंसा संसार से कभी नहीं मिट सकता । अपने जीवन में राणा ने जो प्रतिज्ञा किया था, उसकों अंत तक निभाया ।

सभी सुख सुविधाओं को छोड़कर महाराणा प्रताप ने झोपड़ी में अपना जीवन व्यतीत किया । महाराणा प्रताप की मृत्यु के समय नज़दीक थे । राणा ने चितौड़ को स्वतंत्र नहीं करा पाए। मगर थोड़े से राजपूत सेना के साथ मुगलों को कई बार युद्ध में हराया। अंत में अकबर को युद्ध बंद कर देना पड़ा।

राणा के शौर्य, स्वभिमान और सहनशक्ति से मेवाड़ का प्रत्येक राजपूत शूरवीर और त्यागी बन गया । युद्ध बंद होने तक राणा ने बहादुरी के साथ मुग़ल बादशाह से लोहा लेता रहा और अपना मस्तक कभी भी नीचा नहीं किया ।

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सरदारों से भेट

अब राणा के वृद्धा अवस्था के दिन थे । एक दिन राणा थकान और बेबसी की दशा में लेटे हुए अपने सरदारों से बाते कर थे । अचानक उनके आंखों से आंसू गिरने लगे, इसे देखकर सरदारों ने इसका कारण पूंछा ।

उनकों उत्तर देते हुए राणा ने कहा – ” अब मेरा अंतिम समय है । लेकिन एक ही कारण है जिसके कारण मेरे प्राण नहीं निकल रहे है । ” इतना कहकर राणा ने सरदारों की तरफ देखा और कहा -” आप लोग मेरे सामने प्रतिज्ञा करें की अपने प्राणों के रहते हुए आप लोग मेवाड़ की भूमि पर शत्रुओं को अधिकार नहीं करने देंगे। आपके इस प्रकार का आश्वासन पाकर मै सदा के लिए आँखे बंद कर लूंगा।

मेरा लड़का अमरसिंह अपने पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा। इसको मै जानता हूँ। वह शत्रुओं से अपनी मातृभूमि को सुरक्षित नहीं रख सकता। अमर सिंह स्वभाव से विलासी है । जो कष्टों का सामना नहीं कर सकता ।

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इतना कहने के बाद राणा का गला भर आया और राणा ने कहा-” एक दिन झोपड़ी में प्रवेश करने के समय अमरसिंह अपने सर की पगड़ी उतारना भूल गया था । इसलिए झोपड़ी के दरवाजे पर लगे हुए बांस से टकराकर उसकी पगड़ी नीचे गिर गई । अमर सिंह को यह देखकर बुरा लगा उसने दूसरे दिन मुझसे कहा, रहने के लिए ऐसा महल बनवा दीजिये, जिससे इस प्रकार का कोई कष्ट न हो ।

यह कहते हुए राणा गंभीर हो उठे और कहा – मेरे मरने के बाद झोपड़ियों की जगह में राज महल बनेगे और अमर सिंह उनमे रहा करेगा । राजमहलों में रहने वाला जीवन के कठोर व्रत का पालन नहीं कर सकता ।

सुख की अभिलाषा रखने वाला कभी कोई महान कार्य करने के योग्य नहीं होता । मेवाड़ राज्य की मिली हुई स्वतंत्रता अमर सिंह के समय फिर चली जाएगी । जिस स्वतंत्रता के लिए राजपूत सैनिकों और सरदारों के साथ काँटों से भरे पहाड़ी जंगलों में मैंने पच्चीस वर्ष बीतये और मेरे परिवार के लोगों ने भूंखे- प्यासे रहकर दिन काटें है, वह स्वभिमान और गौरव मेरे मरने के बाद सुरक्षित नहीं रहेगा, इस समय मेरे हृदय की यही पीड़ा है ।

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महाराणा प्रताप के इन बातों को सुनकर सरदारों ने विश्वास दिलाते हुए राणा ने कहा- हम लोग बाप्पा रावल के सिंहासन की शपथ खाकर आपको विश्वास दिलाते है की हम लोगों में जब तक एक भी जीवित रहेगा, मेवाड़ की भूमि पर शत्रुओं का अधिकार नहीं हो सकता ।

हम राजकुमार अमर सिंह को ऐसा कोई काम नहीं करने देंगे जिससे स्वर्ग में आपकी आत्मा को कष्ट पहुंचे । जब तक मेवाड़ राज्य को पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं करा लेंगे, उस समय तक हम झोपड़ियों में ही रहेँगे।

महाराणा प्रताप की मृत्यु कब हुई

सरदारों की मुख से महाराणा प्रताप ने इन शब्दों को सुना और उसके बाद अपनी आँखे बंद कर ली । फिर राणा के नेत्र न खुले । 29 जनवरी 1597 ई में राणा प्रताप ने इस संसार को छोड़कर स्वर्ग की यात्रा की ।

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महाराणा प्रताप की मृत्यु की खबर सुनकर अकबर के आँखों में भी आंसू आ गए थे ।

महाराणा प्रताप की मृत्यु अकबर के दरबारी ने राजस्थानी मे एक छंद लिखा है-

अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी।
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी।
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली।
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली।
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी।
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी।

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इसका अर्थ हैहे गेहलोत राणा प्रतापसिंह तेरी मृत्यु पर मुंगल सम्राट ने आँसू टपकाए । तूने कभी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नही लगने दिया । अपनी पगड़ी को किसी के सामने झुकने नहीं दिया । तू अपना राज्य तो हार हार गया था लेकिन अपने राज्य को बाएँ कंधे से चलाता रहा । रानियाँ कभी नवरोजों मे नहीं गई और तुम कभी बादशाह डेरों मे नहीं गए । और तुमने कभी शाही झरोखे मे नहीं रहे, तुम्हारा सम्मान संसार मे हमेशा बना रहा । तू सभी मे जीत गया और बादशाह हार गया । 

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