पुष्यमित्र शुंग का इतिहास

पुराणों से यह ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य शासक बृहद्रथ कि हत्या कर स्वयं राजा बन गया था । जिस समय मौर्य शासक बृहद्रथ अपनी सेना का निरीक्षण कर रहा था । उस समय पुष्यमित्र ने उसका वध कर दिया । वृहद्रथ एक अत्यंत दुर्बल शासक था तथा जनता कि रक्षा करने में असमर्थ था । पुष्यमित्र ने बृहद्रथ कि हत्या देश को यूनानी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए किया था । देश कि रक्षा के लिए यह आवश्यक था ।

पुष्यमित्र शुंग का इतिहास
पुष्यमित्र शुंग का इतिहास

पुष्यमित्र शुंग वंश का परिचय 

शुंग नाम बहुत प्राचीन है । इस वंश का उल्लेख पाणिनी के अष्टाध्यायी में भी मिलता है । शुंग ब्राह्मण थे और वो शास्त्रविद्या द्वारा अपना जीवन यापन करते थे। शुंग ब्राह्मण होने पर शस्त्र ग्रहण करते थे यह कोई नया बात नहीं था। इसके पहले भी परशुराम, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य ने भी ब्राह्मण होते हुए भी शस्त्र धारण एवं क्षत्रिय कर्म करते थे ।

पुष्यमित्र शुंग परिचय 

पुष्यमित्र शुंग अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ का सेनापति था । उसे सेना का पूर्ण समर्थन प्राप्त था । इसी कारण सेना के सामने ही उसने मौर्य शासक बृहद्रथ कि हत्या का दी और सेना के द्वारा इसका कोई विरोध नहीं हुआ ।

पतंजलि के महाभाष्य में पुष्यमाणवों का उल्लेख है । पुष्यमाणव पुष्यमित्र के समर्थक को कहा जाता था ।

पुष्यमित्र का काल 184 से लेकर 148 ई पूर्व माना जाता है । पुष्यमित्र ने 36 वर्षों तक शासन किया था । इसका इतिहास रक्तरंजित रहा है । पुष्यमित्र का सेना से प्रारम्भ से अंत तक सम्बन्ध रहा । सेना से निरंतर निकट सबंध होने के कारन पुष्यमित्र ने स्वयं को एक समृद्ध साम्राज्य का शासक बनने के बाद भी सेनापति ही कहा है ।

विदर्भ से युद्ध

पहले विदर्भ मगध राज्य का एक भाग था, साम्राज्य के दुर्बल होने पर यह स्वतंत्र हो गया । पुष्यमित्र ने अपने साम्राज्य के पश्चिमी प्रदेशों पर नियत्रण रखने के उद्देश्य से अवंती में अपने पुत्र अग्निमित्र को नियुक्त किया था, जो विदिशा को राजधानी बनाकर शासन करता था । इस समय विदर्भ राज्य के दो दावेदार थे – माधवसेन और यज्ञसेन। माधवसेन सिंहासन का वास्तविक दावेदार था किन्तु यज्ञसेन ने उससे राज्य छीन लिया था ।

यज्ञसेन में माधवसेन को बंदी बना लिया । जब अग्निमित्र ने यज्ञसेन से माधवसेन को छोड़ने को कहा तो उसने माना कर दिया और यह शर्त रखा कि उसका सम्बंधी मंत्री को छोड़ दिया जाय तो वह माधवसेन को छोड़ देगा ।

इसके कारण अग्निमित्र ने  अपने सेनापति वीरसेन को यज्ञसेन से युद्ध करने का आदेश दिया । यज्ञसेन पराजित हुआ । इस युद्ध से शुंगों का का प्रभाव नर्मदा नदी के दक्षिण तक फैल गया था ।

यवन आक्रमण

पुष्यमित्र शुंग के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की रक्षा करने वाली सेना का नेतृत्व उसका पौत्र वसुमित्र कर रहा था । सिंधु नदी के तट पर उसका यवन सेना के साथ भारी युद्ध हुआ जिसमे यवनों को पराजित होना पड़ा। विद्वानों को इस विषय पर मतभेद है की इस यवन आक्रमण का नेता कौन था । डेमेट्रियस अथवा मिनेंङर।

पुष्यमित्र शुंग का अश्वमेघ यज्ञ

प्रतापी सम्राटों के  द्वारा अश्वमेध यज्ञ का संपादन वैदिक काल से चला आ रहा था। अश्वमेघ यज्ञ सम्राट के यश और शक्ति का प्रतीक माना जाता था। पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि पुष्यमित्र के अश्वमेध यज्ञ में स्वयं पतंजलि ने कार्य किया था। महाभाष्य में उनका कथन है कि( इह पुष्यमित्रम याजयामः) यहां हम पुष्यमित्र का यज्ञ कराते हैं।

धनदेव के अयोध्या लेख में पुष्यमित्र को दो अश्वमेघ यज्ञ करने वाला कहां गया है। पुष्यमित्र ने पहला अश्वमेध यज्ञ शासक बनने के तुरंत बाद तथा दूसरा अश्वमेघ यज्ञ यवनों को पराजित करने के बाद किया था।

पुष्यमित्र शुंग का राज्य विस्तार

पुष्यमित्र शुंग के शासक बनने के पहले ही मौर्य साम्राज्य विघटित हो गया था और उसके कई प्रदेश इससे में से निकल गए थे । पुष्यमित्र फिर मगध को पुराना रूप नहीं दे सका पर राज्य के एक बड़े भाग को उसने पुनः एकता के सूत्र में बंधा।

इसके समय में भी पाटलिपुत्र मगध की राजधानी बना रहा जहां वह स्वयं रहता था। विदिशा एक प्रांतीय राजधानी थी जहां से उसका पुत्र अग्निमित्र शासन करता था। इस प्रकार पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सियालकोट तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विदर्भ तक का प्रदेश उसके अधिकार में था।

पुष्यमित्र और बौद्ध धर्म 

साहित्य में पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध धर्म का विरोधी और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का उत्पीड़न करने वाला बताया गया है।दिव्यावदन के अनुसार उसने सियालकोट में यहाँ तक घोषणा कि की जो उसे बौद्ध भिक्षु का एक सिर देगा वह है उसे 100 सोने के सिक्के देगा।

तारानाथ ने भी कहा है कि पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था और उसने बौद्ध विहार जलवा दिए तथा बौद्ध भिक्षुओं का वध किया इस आधार पर कुछ विद्वान पुष्यमित्र को बौद्ध धर्म का उत्पीड़क मानते हैं।

पर पुरातात्विक साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि सांची के स्तूप और वेदिकाओं के रूप में प्राप्त बौद्ध स्मारक शुंग काल के हैं। बौद्धों के प्रति उसके विरोध का कारण राजनीतिक था । उसके राजा बनने पर कुछ बौद्धों ने यूनानियों को सहयोग दिया । इस कारण बौद्धों को दण्ड देने के लिए उनका दमन किया गया।

यदि इस विरोध का कारण धार्मिक होता तो वह अपने गृहराज्य के पास के बौद्ध केंद्रों को पहले नष्ट करता, जो उसने नहीं किया ।

पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी 

पुष्यमित्र शुंग ने  36 वर्षों तक राज्य किया । उसके बाद उसका पुत्र अग्निमित्र शासक बना । वह विदिशा का प्रांतीय शासक था । उसका शासन केवल आठ वर्षों तक रहा । उसके बाद सुज्येष्ठ शासक बना, जिसने सात वर्षों तक शासन किया । यह अग्निमित्र का बड़ा पुत्र था ।

इसके बाद वसुमित्र शासक बना यह अग्निमित्र का पुत्र था। जिसने पुष्यमित्र के अश्वमेघ यज्ञ के समय घोड़े की रक्षा का भार संभाला था और यवनों को पराजित किया था । भागवत इस वंश का नौवां शासक था । इस वंश का अंतिम शासक देवभूति था, जिसका वासुदेव कण्व ने वध करवा दिया था ।

राष्ट्रकूट वंश

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