आधुनिक भारत का इतिहास

आधुनिक भारत का इतिहास, adhunik bharat ka itihas in hindi

आधुनिक भारत का इतिहास
आधुनिक भारत का इतिहास

आधुनिक भारत का प्रारंभ मूंगलों के पतन से होता है । इनके पतन का कारण औरंगजेब के बाद उनके बेटो का सत्ता के लिए आपस मे मतभेद तथा औरंगजेब के द्वारा हिंदुओं के साथ कठोर व्यवहार, धर्मांतरण और उनके धार्मिक स्थानों को तोड़ने के कारण हिन्दू राजाओं ने विद्रोह कर दिया । जिसमे से मराठा प्रमुख थे इन्होंने अधिकांश मुग़ल राज्यों सहित दिल्ली तक कब्ज़ा कर लिया था। इनके साथ अंग्रेजो के स्थायी सत्ता का विकास होता है। इन्होने अन्य यूरोपियों विरोधियों को पराजित कर दिया। और धीरे धीरे पुरे भारत में अपना प्रभुत्व कायम कर दिया था ।

मुगलों का पतन

आधुनिक भारत के शुरुआत में औरंगजेब के उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए और साम्राज्य की शक्ति कमजोर होने लगा । कई प्रांतों के सूबेदार अपने – अपने प्रांतों में अपनी स्व्तंत्रता की घोषणा करने लगे। जिस समय मुग़ल साम्राज्य कमजोर हो रहा था उसी समय भारत पर विदेशी आक्रमण लगातार हो रहे थे ।

अफगान नेता नादिरशाह के आक्रमण ने साम्राज्य को अस्त- वयस्त कर दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके बाद उसका पुत्र बहादुरशाह प्रथम 1701-1712 ई तक मुग़ल वंश का बादशाह बना रहा और इसके मृत्यु के बाद कोई योग्य शासक नहीं रहा मुग़ल साम्राज्य में और सभी सत्ता के लिए आपस में लड़ते रहे ।

मराठा शक्ति का उदय

आधुनिक भारत के अंतर्गत 17 वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में छत्रपति शिवाजी  के नेतृत्व में मराठा शक्ति का उदय हुआ । शिवाजी ने कई मुंगलों सरदारों को हराकर मराठा राज्य राज्य स्थापित किया तथा सम्पूर्ण जीवन मुंगलों से संघर्ष करते रहे साथ ही एक बड़े भू- भाग पर कब्ज़ा कर लिए।

शिवाजी के मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी शम्भाजी ने मुगलों से युद्ध जारी रखा। तथा औरंगजेब ने शम्भाजी को धोखे से बंदी बना लिया और उसका वध कर दिया । इसके बाद शम्भाजी के सौतेले भाई राजाराम ने मुंगलों के साथ संघर्ष किया ।

राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ताराबाई ने संरक्षिका बनकर शासन चलाया । औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुंगलों ने साहू को मुक्त कर दिया और फिर मराठा साम्राज्य 1707 से 1749 तक इनके हांथों में रहा । मराठाओं की वास्तविक शक्ति पेशवा के हांथों में था । पेशवाओं ने मराठा शक्ति को दक्षिण भारत तक फैला दिया था ।

सिक्ख शक्ति का उत्थान

सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने के धार्मिक समुदाय को सैनिक शक्ति के रूप में बदल दिया । गुरु गोविन्द सिंह के बाद उनके एक सेवक बंदा बहादुर ने सिखों को बुलाकर अपने झंडे के नीचे एकत्र कर लिया । किन्तु गुरु गोविन्द सिंह की मुंगलों के द्वारा हत्या के बाद सिक्खों ने मुंगलों से युद्ध करना शुरू कर दिया और 1710 में सिक्खों और मुंगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमे सिक्खों की विजय हुई ।

इसके पश्चात सिक्खों ने कई स्थानों पर मुंगलों को युद्ध में हराया। पर अंत में मुगलों ने बंदा बहादुर को बंदी बना लिया और उसे मौत के घाट उतार दिया । इसके बाद सिखों ने अपने आप को दल खालसा में संगठित कर लिया और यह दल खालसा मुंगलों के लिए घातक सिद्ध हुआ ।

1738 में ईरान के नादिरशाह ने भारत पर कर यहाँ से अतुल सम्पति लूटकर जब वह अपने देश लौट रहा था, तब सिक्खों ने इन पर आक्रमण कर बहुत सारा धन लूट लिया था । इस तरह 1740 तक तक मुग़ल सत्ता का प्रभुत्व समाप्त हो गया।

सिक्खों ने दल खालसा को कई जत्थों में विभाजित कर दिया । आगे चलकर रणजीतसिंह ने इनको जीतकर एक संगठित पंजाब राज्य का स्थापना किया ।

यूरोपीय जातियों का आगमन

पुर्तगालियों का आगमन

1498 में पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा ने भारत के मालावार तट पर पहुँचकर यूरोप से एक सामुद्रिक मार्ग खोज निकाला। इस घटना से भारत और यूरोप में एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ । कालीकट के राजा ने पुर्तगालियों को अपने राज्य में व्यापार करने की अनुमति दे दिया । इन्होंने गोवा, दमन, दीव, हुंगली सहित और कई स्थानों पर व्यापारिक कोठिया स्थापित कार लिया ।

कुछ वर्षों में पुर्तगालियों ने भारत में व्यापार से इतना धन कमाया की उसे देखकर अन्य यूरोपीय जातीय देखकर दंग रह गए।  इसके कारण कई यूरोपीय व्यापारियों ने भी भारत में व्यापार के लिए कम्पनियां स्थापित करने लगे ।

1595 में हालैंड के डच व्यापारियों ने पूर्वी देशों से व्यापार करने के लिए एक कंपनी बनाया । अब भारत में व्यापार के लिए डचों और पुर्तगालों में संघर्ष शुरू हो गया। पर डचों के सामने पुर्तगाल नहीं टिक सके। और मराठाओं ने भी पुर्तगालियों को कई स्थानों पर पराजित कर दिया था ।

ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन

आधुनिक भारत– ब्रिटेन में ईस्ट इंडिया कंपनी स्थापित किया गया तथा 1608 पर इस कंपनी का पहला जहाज सूरत के बंदरगाह पर पहुंचा । इस जहाज का कप्तान हाकिंस था, जो अपने साथ ब्रिटेन के राजा का पात्र लाया था । हाकिंस ने यह पत्र जहांगीर को दिया ।

6 फ़रवरी 1613 को एक शाही फरमान द्वारा अंग्रेजों को व्यापार करने के लिए एक कोठी बनाने तथा मुग़ल दरबार में एक एलची रखने की अनुमति दे दिया गया। सर टामस रो को इस पद पर नियुक्त किया गया, जिसने मुग़ल सम्राट को प्रसन्न कर भारत में अंग्रेजी कोठियां स्थापित करने का आदेश प्राप्त कर लिया ।

अब भारतीय व्यापार में एकाधिकार स्थापित करने के लिए पुर्तगालियों, डचों, अंग्रेजों में संघर्ष शुरू हो गया। अंग्रेजों ने इनकों पराजित कर दिया जिससे अंग्रेजों की शक्ति तेजी से बढ़ने लगा ।

फ्रांसिसीसियों का आगमन 

फ्रांसिसीसियों ने 1664 में एक व्यापारिक कंपनी स्थापित किया । भारत में उन्होंने सूरत, पांडिचेरी, चंदरनगर और मछलीपट्टम  में अपना व्यापारिक कंपनी स्थापित कर लिया। मुगलों के पतन के समय फ्रांसिसीसियों ने तेजी से प्रगति किया । डचों, पुर्तगालियों को पराजित करने के बाद केवल फ्रांसिसी ही अंग्रेजों के प्रतिद्वंदी थे ।

ये दोनों शक्तियां भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना चाहता था । इन दोनों के पास पर्याप्त सेना थी। ये दोनों भारत के देशी राजाओं के युद्धों, झगड़ों तथा राज्यों के उत्तराधिकार के मामलों में हस्तक्षेप कर उन्हें सैनिक सहायता प्रदान कर आरम्भ किया । इस सहायता के बदले में उन्होंने भूमि, धन और अन्य व्यापारिक सुविधा प्राप्त कर लिए।

धीरे- धीरे यह व्यापारी एक राजनैतिक शक्ति बन गए और भारत में राज्य करने के लिए दोनों में संघर्ष शुरू हुआ । 1744 से 1763 के बीच अंगेजों और फ्रांसिसीसियों के बीच युद्ध हुआ, जिसे कर्नाटक का युद्ध कहा जाता है। अंत में अंग्रेज सफल हुए और भारत में राज्य करने का मार्ग साफ़ हो गया।

आधुनिक भारत में अंग्रेजों की सफलता के कारण

  • उस समय भारत के लोगों में राष्ट्रीयता अथवा देशभक्ति की भावना का आभाव था । ऐसी परिस्थिति में भारत वासियों को आपस में लड़ा देना बड़ा आसान था। इतिहासकार मेलीसन ने लिखा है की भारतियों में गैरों पर विश्वाश करने की विलक्षण आदत थी । उन्होंने यूरोपियों पर विश्वास करके उनसे सहयोग और सहायता प्राप्त की, जो भारतीयों के  लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ । 
  • अंग्रेज, भारतीयों की अपेक्षा कम सभ्य थे । उनमें बर्बरता, चालांकी एवं हिंसक प्रवृत्ति कूट- कूट  कर भरी हुई थी । अतः असभ्य एवं बर्बर जाति पर विजय प्राप्त करना कोई नई बात नहीं है ।
  • भारतीयों के मन में अपने पराये का भेद कभी नहीं रहा। अतः ये बाहरी विदेशियों के साथ भी प्रेम और सत्कार का व्यवहार किया।
  • उस समय भारत का व्यापार अंग्रेजों से कई गुना ज्यादा था, पर भारत के लोग व्यापार को ज्यादा महत्व नहीं देते थे ।
  • भारतीयों ने कभी विदेशियों को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा । इनके साथ हुई संधियों को पवित्र मानते थे और कभी छल- कपट का प्रयोग नहीं किया । इसके विपरीत अंग्रेजों ने कभी संधि का पालन नहीं किया।
  • भारतीय शासक अपने राज्य में व्यापारियों के माल की रक्षा करना अपना धर्म समझते थे । इसलिए मुग़ल राजा जहाँगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की अनुमति दे दी।
  • आधुनिक भारत में भारतीयों शासकों और अंग्रेजों के बीच कई युद्ध हुए थे । इन युद्धों में भारतीयों के दो दल थे एक तो विदेशियों का समर्थक और उनका विरोधी । विदेशियों का समर्थक दल विश्वाशघात कर महत्वपूर्ण जानकारी अंग्रेजों के पास पहुँचा देते थे । ऐसे में अंग्रेजों का युद्ध में विजयी होना स्वाभाविक था ।

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