Rahim Ke Dohe In Hindi | रहीम के दोहे अर्थ सहित

Rahim Ke Dohe
Rahim Ke Dohe

Rahim Ke Dohe In Hindi, रहीम के दोहे अर्थ सहित, Rahim Das ke Dohe, rahim ji ke dohe, 

1

रहिमन विद्या, बुद्धि नहि, नहीं धरम, जस ।

भू पर जनम  वृथा धरै, पसु बिन पूँछ- विषान।।

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अर्थ – रहीम कहते है न तो पास में विद्या है , न बुद्धि है, न धर्म कर्म है न यश और न दान आज तक किसी को दिया है । ऐसे आदमी का जन्म लेना धरती पर बेकार है । वह व्यक्ति पशु है बिना पूँछ और और बिना सींगों का ।

2

रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।

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हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय ।।

अर्थ – रहीम कहते है विपदा अच्छा होता है जो थोड़े दिनों के लिए होता है । संसार में विपदा के दिनों में व्यक्ति के बारे में पहचान हो जाता है । कौन हित करने वाला है कौन अनहित करेने वाला है ।

3

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रहिमन वे नर मर चुके, जें कहुँ मागन जाहि ।

उनते पहले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि।।

अर्थ – रहीम कहते है कि जो मनुष्य किसी के सामने हाँथ फ़ैलाने जाते है , वे मृतक के समान होते है । और वे लोग तो पहले से मरे हुए है, जो मांगने पर भी साफ़ इंकार कर देते है ।

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4

रहिमन सुधि सबसे भली, लगै जो बारंबार।

बिछुरे मानुष फिर मिलै, यहै जान अवतार ।।

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अर्थ – रहीम कहते है याद कितना अच्छा होता है जो बार बार याद आता है , बिछड़े हुए मनुष्य की याद ही तो मनुष्य की याद ही तो प्रभु को धरती पर उतारने को विवश का देता है, भगवान् के अवतार लेने का यही कारण है ।

5

राम न जाते हरिन संग , सीय न रावन साथ ।

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जो रहीम भावी कतहुँ, होत आपने हाँथ ।।

अर्थ – रहीम कहते है होनहार यदि अपने हाँथ में होता , उस पर अपना वश चलता , तो माया मृग के पीछे राम क्यों दौड़ते, और रावण क्यों सीता को हर कर ले जाता ।।

6

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रूप कथा, पद, चारूपट, कंचन, दोहा, लाल।

ज्यों-ज्यों निखरत सूक्ष्म गति, मोल रहीम बिसाल ।।

अर्थ – रहीम कहते है रूप कथा और कविता तथा सुन्दर वस्त्र एवं स्वर्ण और दोहा तथा रतन, इन सबका असली मोल तभी आँका जा सकता है, जब इन्हे अधिक से अधिक सूक्ष्मता के साथ इन्हे आँका जाए ।

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7

बरु रहीम कानन भलो , वास करिय फल भोग ।

बंधु मध्य धनहीन हवै, बसिबो उचित न योग ।।

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अर्थ – रहीम कहते हैं कि निर्धन हो जाने के बीच बंधु बन्धओं के बीच  रहना ठीक नही होता । इससे अच्छा तो वन में जाकर बस जाना और वहाँ के फलों पर गुजर करना कहीं अच्छा है ।

8

वे रहीम नर धन्य है, पर उपकारी अंग ।

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बाँटनवारे को लगै, ज्यों मेंहंदी को  रंग ।

अर्थ – रहीम कहते है धन्य हैं  वे लोग जिनके अंग अंग में परोपकार  समा गया है । मेंहदी पीसने वाले के हाँथ अपने आप रच जाते है , लाल हो जाते है ।

9

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सबै कहावैं लसकरी, सब लसकर कहं जाय ।

रहिमन सेल्ह जोई सहै, सोइ जागीरे खाय ।।

अर्थ – रहीम कहते है कि सैनिक कहलाने में सभी को ख़ुशी होता है, सभी सेना में भर्ती होना चाहते है , पर जीत और जागीर तो उसी को मिलता है । जो भाले के वार को फूलों क़ी तरह अपने ऊपर झेल लेता है । Rahim Ke Dohe

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10

समय दशा कुल देखि कै, सबै करत सनमान।

रहिमन दीन अनाथ को, तुम बिन को भगवान।।

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अर्थ – रहीम कहते है सुख के दिन और अच्छा समय और ऊँचा खानदान देखकर सभी सम्मान करते है । किन्तु जो दीन है , दुखी है सब तरह से अनाथ है , उन्हें अपना लेने वाला भगवान के सिवाय और दूसरा कोई नहीं होता है ।

11

समय पाय फल होत है , समय पाय झरि ज़ात।

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सदा रहै नहि एक सी, का रहीम पछितात ।।

अर्थ – रहीम कहते है क्यों दुखी होते हो और क्यों पछता रहे , जब समय आता है, तब वृक्ष फलों से लद जाता है , और फिर ऐसा समय आता है , जब उसके सारे फूल और फल झड़ जाते हैं । समय की गति को न जानने वाला ही दुखी होता है ।

12

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समय – लाभ सम लांभ नहि, समय – चूक सम चूक ।

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।

अर्थ – रहीम कहते है समय पर अगर कुछ बना लिया , तो उससे बड़ा कौन  सा लाभ है । और समय पर  चूक गए तो हाँथ कुछ नहि लगता है । बुद्धिमानों के मन में समय की चूक सदा कसकती रहती है ।

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13

सर सूखे पंछी उड़े, और सरन समाहि।

दीन मीन बिन पंख के, कहुं रहीम कहँ जाहि ।।

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अर्थ – रहीम कहते हैं सरोवर सुख गया और पंक्षी वहाँ से उड़कर दूसरे सरोवर पर चले गए । पर बिना पंखों की मछलियां उसे छोड़ कर कहाँ जायें। उनका जन्म और मृत्यु तो उसी सरोवर में है । Rahim Ke Dohe

14

स्वासह तुरिय जो उच्चरे, तिय है निहचल चित्त ।

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पूरा परा घर जानिए, रहीम तीन पवित्र ।।

अर्थ – रहीम कहते हैं ये तीनों परम पवित्र है – वह स्वास जिसे लेकर योगी त्वरीय अवस्था का अनुभव करता हैं । वह स्त्री जिसका मन पतिव्रत में निश्चल हो गया हो , पर पुरुष को देखकर जिसका मन चंचल नहीं होता । और वह पुत्र जो अपने चरित्र से पुरे कुल का दीपक बन जाता है ।

15

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साधु सराहै साधुता , जती जोगिता जान ।

रहिमन साँचें सूर को, बैरी करैं बखान ।।

अर्थ – रहीम कहते है साधु सराहना करते हैं साधुता की , और योगी सराहते हैं योग को , और सच्चे वीर की सराहना उसके शत्रु भी करते है ।

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16

संतत संपति जान के, सब को सब कुछ देत।

दीनबंधु बिनु दीन की, को रहीम सुधि लेत।।

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अर्थ – रहीम कहते है अगर यह मानकर कि संपत्ति सदा रहने वाला है धनी लोग सबको जो मांगने आते हैं , उनकों सब कुछ देते है । किन्तु गरीबों कि बारें में केवल भगवान को छोड़कर और कोई उनके बारें में कुछ नहीं सोचता । Rahim Ke Dohe

17

ससि संकोच, साहस, सलिल, मान, स्नेह रहीम ।

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बढ़त- बढ़त बढ़ि जात है , घटत घटत घटि सोम।।

अर्थ – रहीम कहते है चन्द्रमा, संकोच, साहस ,जल, सम्मान और स्नेह , ये सब ऐसे है , जो बढ़ते बढ़ते बढ़ जाते है , और घटते घटते घटने की सीमा को छू लेते हैं ।

18

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सीत हरत, तम हरत नित, भुवन भरत नहि चूक ।

रहिमन तेहि रवि को कहा, जो घटि लखै उलूक ।।

अर्थ – रहीम कहते है सूर्य शीत को भगा देता है , अन्धकार का नाश कर सारे संसार को प्रकाश से भर देता है । पर सूर्य का क्या दोष , यदि उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता ।

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19

हित रहीम  इत्उ करैं , जाकी जहाँ बसात ।

नहि यह रहै, न बह रहै , रहे कहन को बात ।।

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अर्थ – रहीम कहते है जिसकी जहाँ तक शक्ति है , उसके अनुसार वह भलाई करता है । किसने किसके साथ कितना भलाई किया , उनमें से कोई नहीं रहता। कहने कि लिए केवल बात रह जाता हैं । Rahim Ke Dohe

20

होय न जाकी छाँह ढिंग , फल रहीम अति दूर ।

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बाढ़ेहु सो बिनु काजही, जैसे तार खजूर।।

अर्थ – रहीम कहतें हैं क्या हुआ जो बड़े हो गए,  ताड़ और खजूर की तरह ,  छाहँ जिसकी पास नहीं ,  और फल भी उसके बहुत दूर – दूर है । बेकार हैं ऐसे बड़े होने से ।  

21

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ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अंगार ज्यों ।

तातो जारै अंग, सीरें पै कारो लगे ।।

अर्थ – रहीम कहते है नीच का साथ छोड़ दो , जो अंगार के समान है । जलता हुआ अंगार अंग को जला देता है , और ठंडा होने पर कालिख लगा देता है ।

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22

रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पआवै मान बनु ।

बरु वष देय बुलाय , मान सहत मरबो भलो ।।

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अर्थ – रहीम कहते हैं वह अमृत भी मुझे अच्छा नहीं लगता, जो बिना मान सम्मान के पिलाया जाय । प्रेम से बुलाकर चाहे कोई विष भी दे दे तो वह अच्छा है। मान के साथ मरना कहीं अधिक अच्छा है ।

23

निज बीती

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चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस ।

जा पर बिपदा परत है, सो आवत यही देस ।।

अर्थ – रहीम कहते है अयोध्या के महाराज राम अपनी राजधानी छोड़कर चित्रकूट में बस गए है । इस अंचल में वही आता है जो किसी विपदा का मारा होता है ।

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24

ए रहीम, दर दर फिरहिं , माँगि मधुकरी खाहि ।

यारों यारी छोड़ दो, वो रहीम अब नहीं ।।

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अर्थ – रहीम आज द्वार – द्वार पर मधुकरी मांगता गुजर कर रहा है । वे दिन चले गए , पहले का वह रहीम नहीं रहा । दोस्तों छोड़ दो दोस्ती , जो तुमने इसके साथ किया था । Rahim Ke Dohe

25

देनहार कोउ और है , भेजत सो दिन रैन।

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लोग भरम हम पर धरैं , याते नीचे नैन ।।

अर्थ – रहीम कहते हैं हम कहाँ किसी को कुछ देते है । देने वाला तो दूसरा ही है , जो दिन रात भेजता रहता है । इन हांथों से दिलाने के लिए। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो गया है की रहीम दान देता है । मेरे नेत्र इसलिए नीचे झुक जाते है कि मांगने वाले को यह पता न चले कि उसे कौन दे रहा है , और दान लेकर उसे अपने गरीबी का एहसास न  हों ।

26

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ध्यान और वंदना

जेहि रहीम मन आपनो,  कीन्हो चारु चकोर।

निसि – बासर लाग्यो रहे , कृष्ण चंद की ओर ।।

अर्थ – रहीम कहते है जिस किसी ने अपने मन को सुन्दर बना लिया, वह नित्य निरंतर, रात और दिन, श्री कृष्ण रूपी चंद्र की ओर टकटकी लगाकर देखता रहता है ।

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27

रहिमन कोऊ का करै, ज्वारी, चोर लबार।

जो पत- राखनहार है, माखन – चाखनहार।।

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अर्थ – रहीम कहते है जिसकी लाज रखने वाला माखन के चाखन हार लेने वाले स्वयं श्री कृष्ण है , उसका कौन की बिगाड़ सकता है । न तो कोई जुआरी उसे हरा सकता है , न कोई चोर उसकी  किसी वस्तु को चुरा सकता है और न कोई बुरा व्यक्ति व्यक्ति उनके साथ बुरा व्यव्हार कर सकता है । Rahim Ke Dohe

28

रहिमन गली हैं सांकरी, दूजो नहिं ठहराहि।

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आपु अहै, तो हरि नहीं , हरि , तो आपनु नाही ।।

अर्थ – रहीम कहते हैं गली बहुत संकरा है उसमें दो लोग एक साथ कैसे जा सकते है । यदि तू ने सारा जगह घेर लिया तो , तो हरि के लिए वहाँ कहाँ ठौर है और हरि उस गली में आ बैठे तो तेरा गुजारा कैसे होगा ।

29

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धनि रहीम गति मीन की , जल बिछुरत जिय जाय ।

जियत कंज तजि अनत बसि, कहा भौर को भाय।।

अर्थ – रहीम कहते हैं धन्य हैं मछली का अनंत प्रेम , प्रेमी से अलग होकर और उस अपने प्राण त्याग देती है । और यह भ्रमर अपने प्रियतम कमल को छोड़ कर दूसरे जगह उड़ जाता है ।

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30

पीतम छबि नैनन बसी, पर – छबि कहां समाय ।

भरी सराय रहीम लखि, पथिक आप फिर जाय ।।

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अर्थ – रहीम कहते हैं जिन आँखों में प्रियतम की सुन्दर रूप बस गया है , वहां किसी दूसरे के रूप को कैसे जगह मि सकता है । भरी हुई सराय को देखकर पथिक स्वयं वहां से लौट जाता है । Rahim Ke Dohe

31

प्रेम, Rahim Ke Dohe

रहिमन पैडा प्रेम को , निपट सिलसिली गैल।

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बिलछत पांव पिपली को, लोग लदावत बैल ।।

अर्थ – रहीम कहते हैं प्रेम के रास्ते में कितना ज्यादा फिसलन हैं । चींटी के भी पैर फिसल जाते है इस पर और हम लोगों को देखों तो बैल लाद कर चलते है । दुनियां भर का अहंकार सिर पर लाद कर कोई कैसे प्रेम के मार्ग पर चल सकता है । वह तो फिसलेगा ही ।

32

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रहिमन धागा प्रेम  को, मत तोड़ो चटकाय ।

टूटे से फिर ना मिले, मिले गांठ पड़ जाय ।।

अर्थ – रहीम  कहते है बड़ा ही नाजुक धागा है प्रेम का,  झटका देकर मत तोड़ों इसे,  टूट गया तो फिर जुड़ेगा नहीं , और जोड़ भी लिया तो गाँठ पड़ जाएगा ।

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33

रहिमन प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।

ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून।।

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अर्थ –  रहीम कहते है सराहना ऐसे ही प्रेम की की जाय जिसमें अंतर न रह जाय । चुना और हल्दी मिलकर अपना- अपना रंग छोड़ देते हैं । न दृष्टा रहता हैं और न दृश्य, दोनों एकाकार हो जाते है ।

34

कहा करौ बैकुण्ठ लै, कल्प वृक्ष की छांह।

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रहिमन ढाक सुहावनो , जो गल पीतम – बाँह।।

अर्थ – रहीम कहते हैं बैकुण्ठ जाकर कल्प वृक्ष की छाह तले बैठने में क्या रखा है । यदि पैसा में प्रियतम न हो । उससे अच्छा तो ढांक का पेड़ सुखदायक हैं , यदि छाह में प्रियतम के साथ गले लगाकर बैठने को मिले । Rahim Ke Dohe

35

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जे सुलगे ते बुझ गए , बुझे ते सुलगे नाहि।

रहिमन दोहे प्रेम के , बुझि- बुझिकै सुलगाहि।।

अर्थ – रहीम कहते है आग में पड़कर लकड़ी सुलग- सुलग कर जल जाता है , बूझकर वह फिर सुलगता नहीं । लेकिन प्रेम की आग में जलने  वाले प्रेमीजन बूझकर भी सुलगते रहते है ।

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36

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार ।

रहिमन फिर – फिर पोइए , टूटे मुक्ताहार ।।

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अर्थ – रहीम कहते है अपना प्रिय एक बार तो क्या , सौ बार भी रूठ जाय, तो भी उसे मना लेना चाहिए । मोतियों के हार टूट जाने पर धागे में मोतियों को बार – बार पिरो लेते हैं ।

37

यह न रहीम सराहिये, देन लें की प्रीति।

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पानन बाज़ी रखिये, हार होये कै जीत ।।

अर्थ –  रहीम कहते है ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमे लेन देन का नाता जुड़ा हो । प्रेम क्या कोई खरीदने – बेचने की चीज़ है । इसमें तो लगा दिया जाय प्राणो का दांव , परवाह नहीं हार होगा या जीत । Rahim Ke Dohe

38

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रहिमन मैन तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहि ।

प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहि ।।

अर्थ – रहीम कहते है प्रेम के मार्ग पर हर कोई नहीं चल सकता है । बड़ा कठिन है इस पर चलना , जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार हो आग  पर चलना ।

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39

वहै प्रीत नहीं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत ।

घटत- घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत।।

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अर्थ – रहीम कहते है कौन उसे प्रेम कहेगा , जो धीरे धीरे घट जाता है । प्रेम तो वह है , जो एक बार किया जाय , तो घटना कैसा । वह रेत तो हैं नहीं, जो हाँथ में लेने पर छन-छन कर गिर जाय ।

40

राम- नाम

गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव ।

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रहिमन जगत- उधार को, और न कछु उपाय।।

अर्थ – रहीम कहते है संसार सागर के पार ले जाने वाली नाव राम की एक शरणागति है । संसार से उद्धार पाने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है । Rahim Ke Dohe

41

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राम नाम जान्यों नहीं , भाई पूजा में हानि ।

कहि रहीम क्यों मानिहैं , जम के किकर कानि।।

अर्थ – रहीम कहते है मैंने राम नाम की महिमा को जाना नहीं और पूजा पाठ करता रहा । बात बिगड़ता ही गया, यमदूत मेरे एक नहीं सुनेंगे, मेरी लाज अब कैसे बचेगी।

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42

राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि ।

कहि रहीम तिहि आपुनो, जनम गवायों बाधि।।

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अर्थ – रहीम कहते है मैंने तो राम नाम का महत्व नहीं जाना और जिसे जानने का जतन किया , वह सारा व्यर्थ था । राम का ध्यान तो किया नहीं और वासनाओं ने सदा लिपटा रहा ।

43

मित्र , Rahim Ke Dohe

मथत- मथत माखन रहे , दही मही बिलगाय ।

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रहिमन सोइ मीत है, भीर भरे ठहराय।।

अर्थ – रहीम कहते है सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत के समय काम देता है। वह किस काम का मित्र , जो विपत्ति के समय भाग जाता है । मक्खन मथते – मथते रह जाता है , किन्तु मट्ठा दही का साथ छोड़ देता है ।

44

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जिहि रहीम तन मन लियो, कियो हिये बिच भौन।

तासों दुःख – सुख कहन की, रही बात अब कौन ।।

अर्थ – रहीम कहते है जिस प्रिय मित्र ने तन और मन पे कब्ज़ा कर लिया है और ह्रदय में जो सदा के लिए बस गया है । उससे सुख और दुःख कहने की अब कौन सी बात रह गयी है ।

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45

जे गरीब सों हित करें, धनि रहीम ते लोग ।

कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण – मिताई -जोग।।

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अर्थ – रहीम कहते है धन्य है वे लोग , जो गरीबों से प्रीति जोड़ते है । बेचारा सुदामा क्या द्वारिका धीश कृष्ण की मित्रता के योग्य थे।

46

हरि रहीम ऐसी करी, ज्यों कमान सर पूर।

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खेंचि आपनी ओर को, डारि दीयों पुनि दूर ।।

अर्थ – रहीम कहते है जैसे धनुष पर चढ़ाया हुआ तीर पहले  तो अपनी तरफ खींचा जाता है , और फिर उसे छोड़कर बहुत दूर फेंक देते हैं । वैसे ही प्रभु पहले आपने तो कृपा कर मुझे अपनी ओर खींच लिया और फिर इस तरह दूर फेक दिया कि मै दर्शन पाने को तरस रहा हूँ । Rahim Ke Dohe

 

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कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में

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