Tulsidas Ke Dohe In Hindi | तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित

1

Tulsidas Ke Dohe
तुलसीदास

Tulsidas Ke Dohe In Hindi, तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित, गोस्वामी तुलसीदास के दोहे


1

कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दँडै चक्र।

तुलसी यह निश्चय भई बढ़ि लेति नव बक्र॥

अर्थ– तुलसीदास जी कहते है कलियुग कि चाल शुभ बुद्धि को हरने वाली है, इसलिए राज चक्र भी सरल स्वभाव के साधुओं को दंड देता हैं । और कलियुग में कुटिलता धीरे-धीरे बढ़ रहा है ।


2

खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग ।

कै खरिया मोही मेली कै बिमल बिबेक बिराग ॥

अर्थ – कहते है कि साधु होने के बाद तुलसीदास तो एक दिन उनकी पत्नी मिल गयी । पत्नी ने उनकी झोली में सफ़ेद गोपीचन्दन और कपूर देखकर कहा कि – हे प्रियतम । जब आप अपनी झोली में खरी और कपूर आदि सब सामान रखते है तब स्त्री का त्याग सही नहीं है। आप मुंझे भी अपनी इस झोली मे डाल दीजिये, अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्य को धारण कीजिये । कहते है उसी समय से तुलसीदासजी ने झोली-झण्डा फेक दिया था ।


3

सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग ।

घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥

अर्थ – अधजली भागने वाली सती को सिर खोलने के लिए किसने कहा था । सगे सबंधी तो सब रोक रहे थे । इससे तो यही अच्छा था कि स्वामी के वियोग कि अग्नि मे सदा जली करती और घर बैठे ही सती कहलाती । इसका अर्थ यह है कि साधु होकर फिर विषयों की ओर ललचाने से तो घर बैठे भजन करना ही सही है ।


मृत्यु पर तुलसीदास के दोहे, Tulsidas Ke Dohe

4

तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच ।

चपरी चपेटे देत नित केस गहे का नीच ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कि रे नीच । हाथों से तेरी चोटी पकड़कर मृत्यु जल्द ही झपटकर तेरे चपत जमा रही है । यह दशा देखकर, सुनकर और अनुभव करके तू नहीं समझता । हर पल शरीर का क्षय हो रहा है । यह सब देखते हुए भी व्यक्ति अपनी मौत को भूलाकर वस्तुओं के भोग विलास मे लगा रहता है ।


5

जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार ।

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कि विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है। परंतु संतरुपि हंस दोष रूपी जल को तयाग कर त्याग कर गुण रूपी दूध को ग्रहण करते है ।


6

जो जो जेहिं जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि ।

रसगुन दोष बिचारिबों रसिक रीति पहिचानि ॥

अर्थ– तुलसीदास जी कहते है जो जो जिस जिस रस मे मग्न होता है, वह उसी मे संतोष मानकर आनंदित रहता है । पर उसके गुण दोष का विचार तो रसिक जन करते है ।


7

अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं ।

तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं॥

अर्थ– तुलसीदास जी कहते है कि दाता अमर रहते हैं उनकी कीर्ति संसार मे बना रहता है और याचक मरते रहते है । मागना मरने के तुल्य ही है । बार-बार मरते है और बार-बार दान लेते है । फिर भी वे पापी याचक दाता को सदा दोष ही देते रहते है ।


सुंदरता पर तुलसीदास के दोहे, Tulsidas Ke Dohe

8

तुलसी देखि सुनेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥

अर्थ– तुलसीदास जी कहते है कि सुंदर वेष देखकर मूर्ख के साथ-साथ चतुर व्यक्ति भी धोखा खा जाता है । सुंदर मोर को ही देख लो उसका वचन तो अमृत के समान है लेकिन उसका भोजन साँप है ।


9

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए ।

अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए ॥

अर्थ– तुलसीदास दास जी कहते है, भगवान राम पर भरोसा करिए और बिना किसी भय के चैन कि नींद सोइए । कोई अनहोनी नहीं होने वाला और यदि कुछ अनिष्ट होने वाला है तो वह होकर रहेगा । इसलिए व्यर्थ कि चिंता छोड़ अपने काम मे लगे रहिए ।


विपत्ति पर तुलसीदास के दोहे

10

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥

अर्थ– तुलसीदास दास जी कहते है किसी विपत्ति के समय आपको ये सात गुण बचायेगें । ज्ञान, विनम्रता, बुद्धि, साहस, अच्छे कर्म, सत्यनिष्टा और भगवान के प्रति विश्वास ।


11

ठाड़ों द्वार न दै सकै तुलसी जे नर नीच ।

निंदहिं बलि हरिचन्द को का कियो करन दधीच ॥

अर्थ – तुलसीदास दास जी कहते है कि जो मनुष्य नीच प्रकृति के है । वे खुद द्वार पर खड़े हुए भिक्षुक को कुछ नहीं दे सकते, पर राजा बलि और हरिश्चंद्र कि निंद्रा करते है, और कहते है कि कर्ण और दधीचि ने कौन सा बड़ा काम किया था । Tulsidas Ke Dohe


12

तुलसी देवल देव को लागे लाख कारोरी ।

काक अभागें हगी भरयो महिमा भई कि थोरी ॥

अर्थ – तुलसीदास दास जी कहते है जिस देव मंदिर को बनवाने मे लाखों करोड़ो रुपये लगे हो, उसमें यदि अभागे कौएं ने बीट लकार दी तो इससे उस मंदिर की महिमा घट थोड़े जाती है, वह तो वैसे ही बना रहता है।


13

 रकापति षोडस उअहिं तारा गन समुदाइ ।

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि रति न जाइ ॥

अर्थ – तुलसीदास दास जी कहते है चाहे चंद्रमा समस्त तारा गणों के साथ लेकर और सोलह कलाओं से पूर्ण होकर उदय हो जाय और साथ ही सभी पहाड़ों मे आग लगा दिया जाय, फिर भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकता ।


14

तुलसी संगति पोंच कि सूजनहिं होति म-दानि ।

ज्यों हरि रूप सुताहि तें कीनि गोहारी आनि ॥

अर्थ – तुलसीदास दास जी कहते है सज्जन के लिए नीच की संगति भी अच्छा होता है । जैसे विष्णु रूप बने हुए बढ़ई से विवाह करने वाली राज कन्या की पुकार सुनकर साक्षात भगवान विष्णु ने आकार सहायता किया ।


15

फेरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार ।

कायर क्रूर कुपूत कलि घर घर सहस डहार ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कि जैसे गलत व्यक्ति के कहने पर मूर्ख लोग घर के सिल लोढ़े को फोड़ डालते है । इस प्रकार अपने ही घर वालों को तंग करने वाले कायर, क्रूर, और कुपूत कलियुग में हजारों की संख्या में घर-घर होंगे ।


16

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महूँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करई कल्यान ॥

अर्थ –  तुलसीदास जी कहते है कि सत्य, अहिंसा, शौच और दान धर्म के ये चार चरण प्रसिद्ध है । जिनमें से कलियुग में दान ही प्रधान रह गया है । किसी भी प्रकार से दान देने पर कल्याण ही होता है ।


कलियुग पर दोहे,Tulsidas Ke Dohe

17

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।

गाई राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुग के समान और कोई भी युग नहीं है । क्योकि इस युग में केवल श्री राम चंद्र जी के निर्मल गुण समूहों का गान करने से मनुष्य बिना किसी परिश्रम के इस भवसागर से तर जाता है ।


18

श्रवन घटहुं पुनि दृग घटहुं घटउ सकल बल देह।

इते घटें घटिहै कहा जौं न घटै हरिनेह ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कानों से चाहे कम सुनायी पड़े, आँखों से कम दिखाई देने लगे, पूरे शरीर का बल भी क्षीण हो जाय, अगर श्री हरि में प्रेम नहीं घटे तो इनके घटने से हमारा क्या घट जाएगा ।


19

कुसमय का प्रभाव

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन ।

अब तो दादुर बोलिहैं हमें पुंछिहै कौन ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है बरसात के मौसम में कोयल यह समझकर मौन हो जाती है कि अब तो मेढक टर्रायेगे, हमें कौन पूछेगा । बुरा समय आने पर दुर्जनों की ही चलती है, उस समय सज्जन चुप रहते हैं ।


20

श्री राम जी के गुण की महिमा, Tulsidas Ke Dohe

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।

दहन राम गुन ग्राम जिमि ईधन अनल प्रचंड ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कलियुग के कुमार्ग, कुतर्ग, कुचाल, कपट, दंभ और पाखंडों को जलाने के लिए श्री राम चंद्र जी के गुण समुदाय वैसे ही है, जैसे ईधन को जलाने के लिए प्रचंड अग्नि ।


21

कलि पाषंड प्रचार प्रबल पाप पावंर पतित।

तुलसी अभय आधार राम नाम सुरसरि सलिल ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है की कलियुग में केवल पाखंड का प्रचार है, संसार में पाप बहुत बढ़ गया है । सब ओर पामर और पतित ही दिखाई देते है । ऐसे समय में दो ही आधार है – एक श्री राम नाम और दूसरा देवनदी श्री गंगा जी का पवित्र जल ।


22

रामचन्द्र मुख चंद्रमा चित चकोर जब होई ।

राम राज सब काज सुभ समय सुहावन सोई ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जिस समय भगवान श्री रामचंद्र जी के मुख चंद्र को देखने के लिए चित्त चकोर बन जाता है । वही समय राम राज्य की भांति सुहावना होता है और तभी सब काम शुभ होते हैं ।


23

मानिमय दोहा दीप जंह उर घर प्रगट प्रकास ।

तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥

अर्थ – तुलसीदास कहते है जिसके हृदय में इन दोहों रूपी मणिमय दीपक का प्रकाश प्रगट होता है, वहाँ मोह रूपी अंधकार, भयरूपी रात्री और कलि काल रूपी कालिमा का विलास नहीं हो सकता।


24

क्या भाषा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँच ।

काम जु आवै कामरी का लै करिअ कुमाच ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है क्या भाषा, क्या संस्कृत केवल सच्चा प्रेम चाहिए । जहाँ कंबल से ही काम चल जाता है, वहाँ बढ़िया दुशाला लेकर क्या करना है ।


25

राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास ।

सुमिरत शुभ मंगल कुसल दुहूँ दिसि तुलसीदास ॥

अर्थ– तुलसीदास जी कहते है – जिसका राम नाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एक मात्र गति है और राम नाम में जिसका विश्वास है, उसके लिए राम नाम का स्मरण करने से ही दोनों ओर( इस लोक और परलोक मे) शुभ, मंगल और कुशल है ।Tulsidas Ke Dohe


26

ब्रम्हा राम तें नामु बड़ बार दायक बर दानि ।

राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जिय जानि॥

अर्थ – निर्गुण ब्रम्हा और सगुण राम से भी रामनाम बड़ा है, वह वर देने वाले देवताओं को भी वर देने वाला है । महान ईश्वर श्री शंकर जी ने इस रहस्य को मन में समझकर ही राम चरित्र के सौ करोड़ श्लोक में से राम नाम को ही ग्रहण किया है ।


27

राम राज्य कि महिमा

राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि ।

राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं – राम राज्य मे सभी नर नारी अपने-अपने धर्म में रत होकर शोभित हो रहे है । कहीं भी राग, क्रोध, दोष और दुख नहीं है । धर्म, काम, मोक्ष – चारों आसानी से प्राप्त हो रहे है ।


28

राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास ।

तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास ॥

अर्थ –  तुलसीदास जी कहते हैं – राम राज्य में सब प्रकार से संतोष और सुख है, घर में तथा वन में दोनों ही जगह सब प्रकार की सुविधा है । वृक्ष कल्प वृक्ष के समान और पृथ्वी कामधेनु के समान इच्छा मात्र को पूर्ण करती है और मनोवांछित भोग-विलास सबको प्राप्त है ।


29

खेती बनि विद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज ।

तुलसी सुरतरु सरिस सब सुफल राम कें राज ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री रामचंद्र के राज्य में खेती, मजदूरी, विद्या, व्यापार, सेवा और कारीगरी तथा अन्य सुंदर कार्य कल्प वृक्ष के समान सब सुंदर फलों को देने वाले हैं । Tulsidas Ke Dohe


30

कोंपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज ।

तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम के राज ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री रामचंद्र जी के राज्य में प्रेम की रीति सीमा तक पहुँच गया था । इनसे न तो किसी के क्रोध करने पर कोई उसकी चिंता करता और न कोई उसका उपकार करता । सब लोग सबका काम प्रेम से करते । काम करने पर कोई किसी पर अहसान नहीं जताता था । Tulsidas Ke Dohe


31

दशरथ महिमा

तुलसी जान्यों दशरथहिं धरमु न सत्य समान ।

रामु तजे जेही लागि बिनु राम परिहरे प्रान ॥

अर्थ –   तुलसीदास जी कहते हैं कि दशरथ जी ने इस तत्व को समझ लिया था कि सत्य के समान कोई धर्म नहीं हैं । जिस सत्य के लिए उन्होने श्री राम को त्याग दिया और श्री राम के विरह मे प्राण त्याग दिये ।


32

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान ।

तुलसी दया न छड़िए जब लग घट में प्राण ॥

अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योकि दया ही धर्म का मूल कारण है । इसके विपरीत अहंकार सभी पापों का जड़ होता है ।


33

आवत ही हरषैं  नहीं नैनन नहीं सनेह ।

तुलसी तहां न जाइयें कंचन बरसे मोह ॥

अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि जहां आपके जाने से लोग खुश नहीं होते है । जहाँ लोगों की आँखों मे आपके लिए प्रेम न हो । वहाँ कभी भी नहीं जाना चाहिए। चाहे वहाँ धन की वर्षा क्यों न हो ।


34

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहूँ ओर ।

बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है कि मीठे वचन से चारो ओर सुख फैलते  हैं । किसी को भी वश करने का यह एक वशीकरण मंत्र है । इसलिए सभी मनुष्य को कठोर वचन त्याग कर मीठे वचन बोलना चाहिए ।


36

दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ।

तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ।।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं संपत्ति शरीर की छाया के समान है । इसको पीठ देकर चलने से यह पीछे पीछे चलता है, और सामने होकर चलने से दूर भाग जाता है । ( जो धन से मुँह मोड लेता है, धन की नदी उसके पीछे पीछे बहती चली आती है और जो धन के लिए सदा ललचाता रहता है, उसे सपने में पैसा कभी नहीं मिलता ) इस बात को समझकर घर मे ही दिन बिताओं । Tulsidas Ke Dohe


37

तुलसी अदभुत देवता आसा देवी नाम ।

सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम ।।

अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि आशा देवी नाम की एक अदभुत देवी है, यह सेवा करने पर दुख देता है और विमुख होने पर सुख देता है ।


38

मोह महिमा, Tulsidas Ke Dohe

सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत ।

तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ।।

अर्थ – तुलसीदास कहते है वही सेमलता पेड़ है और वहीं तोते है तो भी मोहवश वसंत ऋतु आने पर सदा उस पर मँडराये रहते है । इस बात को सुनकर संत लोग भी मोह की महिमा की सराहना करते हैं ।


39

लोभ की प्रबलता, Tulsidas Ke Dohe

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।

केहि कै लोभ बिडंबना कीनिह न एहिं संसार ॥

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, पण्डित और गुणों का धाम इस संसार में ऐसा कौन मनुष्य हैं, जिसकी लोभ ने मिट्टी पलीद न की हो ॥


40

माया की फौज

ब्यापी रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ।

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ।।

अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि माया की प्रचंड सेना संसार भर मे फैल रहा हैं कामादि(काम, क्रोध, मद, मोह, और मत्सर) वीर इस सेना के सेनापति हैं और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा है । Tulsidas Ke Dohe


41

तुलसी इस संसार में भाँति भाँति के लोग ।

सबसे हस बोलिए नदी नाव संजोग ॥

अर्थ – गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि इस संसार मे कई प्रकार के लोग रहते है । जिनका व्यवहार और स्वभाव अलग अलग होता है । आप सभी से मिलिए और बात करिए । जैसे नाव नदी से दोस्ती कर अपने मार्ग को पार कर लेता है । वैसे आप अपने अच्छे व्यवहार से इस भव सागर को पार कर लेंगे . Tulsidas Ke Dohe


कबीर दास के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में

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