छत्रपति शिवाजी महाराज | Shivaji Maharaj History In Hindi

छत्रपति शिवाजी महाराज(shivaji maharaj) भारतवर्ष के महान राजा और देश भक्त थे, जिन्होंने मराठा साम्राज्य की नीव रखी । 1674 में रायगढ़ में इनका राज्य अभिषेक हुआ और छत्रपति बने

Shivaji-Maharaj
Shivaji Maharaj

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)ने धर्म की रक्षा के लिए विदेशी मुंगलो के विरुद्ध पूरा जीवन संघर्ष किया। उस समय  भारत छोटे छोटे रियासतों में बटा हुआ था। मुगल शासक ,छल ,कपट कर धीरे-धीरे  रियासतों पर कब्ज़ा कर रहे थे और हिन्दुओं का बल पूर्वक धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनाया जा रहा था।

मुगल शासक  प्रारम्भ से ही हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए व्याकुल थे। सच बात तो यह हिन्दू  धर्म की सबसे बड़ी विशेसता यह थी की न तो अकबर जैसे मिलनसार शासक की मिलनसारी हिन्दू धर्म का अस्तित्व मिटा सकी न ही औरंगजेब जैसे अधर्मी अत्याचारी बादशाह की तलवार भी हिन्दुओं का अंत न  कर सकी।

मगर इसमें संदेह नहीं है की मुगलों के शसनकाल  में एक बहुत बढ़ा भाग हिन्दू धर्म को छोड़ कर मुसलमान हो गया था।इन सब के पश्चात हिन्दू धर्म की विशेषताओ ने इस संकट के समय अपने धर्म को कई महान राजाओं और हिन्दुओं ने बचा लिया ।

छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास, shivaji maharaj history in hindi

शिवाजी महाराज का जन्म 

  • जन्म       –      19 फ़रवरी 1630
  • स्थान      –       शिवनेर (बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय बृहस्पतिवार को हुआ था )
  • पिता       –       शाहजी भोंसले
  • माता       –       जीजा बाई
  • गुरु         –       रामदास
  • पत्नी       –       साई बाई व सायरो बाई
  • पुत्र          –       राजाराम  व शम्भाजी

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय भारत

उनके जन्म के कुछ महिने बाद दिल्ली के बादशाह जहाँगीर की मृत्यु हो गई। उस समय दिल्ली के बादशाहों  का राज्य पुरे उत्तर भारत में फ़ैल चूका था और दक्षिण के राजाओं ने भी अधीनता स्वीकार कर लिया था।

छत्रपति-शिवाजी-महाराज
छत्रपति शिवाजी महाराज

अकबर ने पश्चिम में काबुल से लेकर पूर्व में बंगाल उत्तर में कश्मीर और दक्षिण के इलाकों में भी अपना कब्ज़ा कर लिया था। उस समय एक मात्र मेवाड़ के राजा महराणाप्रताप थे। जिन्होंने अपने  देश और स्वतंत्रता के लिए अकबर से जीवन भर युद्ध किया और जीते जी उसकी अधीनता नहीं स्वीकार किया। 

 

भोंसले वंश, Bhonsle Caste

भोंसले वंश दक्षिण के आठ प्रसिद्ध मराठा वंशो में एक प्रतिष्ठित वंश मना  जाता है। परंतु कितने ही लोगो को यह संदेह अब भी है कि शिवाजी के पूर्वज क्षत्रिय नहीं थे। मगर प्रसिद्ध मुसलमान लेखक-इतिहासकार लिखते है की शिवजी उदयपुर राजवंश के थे।

कई इतिहासकारों का भी मत यही है किन्तु नामो से भी पता चलता है कि पठानों के समय में मेवाड़ के सिसोदिया वंश में एक शिवरामजी हुए थे। उनके तीन पुत्र थे जिसमे से दो तो मुसलमानो के अत्याचारों के शिकार हो गए। और छोटे पुत्र भीमसिंह  पिता कि मृत्यु के पश्चात  गद्दी पर बैठे थे।

भीमसिंह के पीछे उनके पराक्रमी पुत्र विजय भानु ने मुसलमानों के साथ जन्म भर युद्ध जारी रखा था। इनके पश्चात कर्राखेल राजा हुए वो मुसलमानों से लड़ते-लड़ते लाचार हो गए तब उन्हें राजस्थान त्याग देना पड़ा और वो दक्षिण में दौलताबाद के पास वेरुला नामक गांव के भोंसले दुर्ग में बस गए। तभी से उनके वंशज भोंसले कहलाने लगे। 

शिवाजी का मुगल शासक के प्रति सोच 

कहते है कि जब शाहजी बीजापुर दरबार में थे तब मुरारपंत ने एक दिन बालक शिवाजी से कहा कि चलो आज तुम्हें दरबार में ले चले और बादशाह को सलाम कराये। बालक शिवाजी ने घृणा पूर्वक कहा हम हिन्दू है और बादशाह यवन है जो महा नीच होते हैं।

हम गौ ब्राह्मण के सेवक और वह इनका शत्रु हैं। ऐसे को तो छूना पाप है। मैं न तो ऐसे मनुष्य को अपना बादशाह मान सकता हूँ और न उसे सलाम करना चाहता हूँ। सलाम करना तो दूर रहा मन में तो आता है उसका गला ही काट डालू।

मुरारपंत ने बालक की बात  आश्चर्य के साथ सुनी और उनके माता पिता को भी सुनाया।  और  जब शिवाजी को दरबार में ले गए तो वहां उसने बादशाह को सलाम नहीं किया। शाहजी ने ये बात कह कर टाल दी कि अभी यह बालक है इसलिए दरबार के नियम यह क्या जाने। परन्तु जैसे ही शिवाजी दरबार से लौटे उन्होने स्नान किया और नए कपड़े पहने।

शिवाजी का सफलता का कारण 

  • महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ
  • मालवा क्षेत्र के साहसी जवान
  • महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का प्रभाव
  • शिवजी की छापामार युद्ध नीति

 शिवाजी का विजय अभियान 

  • सिंहगढ़ का किला
  • तोरण का किला

बीजापुर रियासत को  जीता तथा जीते हुए धन से रायगढ़ किले का निर्माण करवाया

  • रायगढ़ का किला
  • पुरंदर का किला
  • रायगढ़ को राजधानी बनाया
  • जबाली का किला

तोरण दुर्ग पर अधिकार 

मराठों के पास कोई शक्तिशाली दुर्ग नहीं था जब तक कोई दृढ़  दुर्ग हाँथ में नहीं आता तब तक शक्ति कैसे ढृढ़ हो शक्ति थी । यह सोच शिवा जी किसी मजबूत दुर्ग जीतने की सोचने लग गये।

shivaji

उस समय शिवाजी के प्रमुख तीन सलाहकार थे। पहले देशमुख वजीफसलकर और जमींदार  यज्ञजी कंक तथा तानाजी मुलसरे। इन तीनों पर शिवा जी का अधिक विश्वास था। पूना की जागीर में कोई दुर्ग नहीं था इसलिए शिवाजी इसे लेने की रणनीति तैयार करने लगे।

तोरण दुर्ग पूना के दक्षिण -पश्चिम भाग में 30 मील की दूरी पर था जिसका मार्ग बहुत ही कठिन था मगर शिवाजी सभी कठिनाइयों का सामना करते हुए किसी तरह स्वयं दुर्ग के अध्यक्ष को  मिला लिया था। तथा बिना लड़े ही शिवाजी ने अपने बुद्धि कौशल से दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

इस दुर्ग की सबसे बढ़ी विशेषता यह थी की एक तो इसका मार्ग दुर्गम था और यह ऐसी पहाड़ी पर स्थित था कि यहाँ से थोड़े ही योद्धा भारी सेना से लोहा ले सकता था। यह राज्य उन दिनों बीजापुर राज्य के अधीन था यह दुर्ग लेने के समय शिवाजी कुल 16 वर्ष के थे।

शिवाजी महाराज(shivaji maharaj )की दिल्ली यात्रा 

औरंगजेब ने स्वयं शिवाजी को एक चिट्ठी लिखी जिसमें उनकी वीरता की सराहना करते हुए उन्हें एक कीमती दुशाला भेजा और औरंगजेब ने लिखा कि आप दिल्ली आए जिसमें दरबार में बुलाकर आपका आदर सत्कार किया जाय और फिर आदर सहित दक्षिण लौटने की आज्ञा दी जाय।

राजा जयसिंह ने शिवाजी को विश्वास दिलाया कि वे उनके कुशलता के जिम्मेदार हैं। इस विश्वास पर शिवाजी दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गए। और सन् 1666 बसन्त काल में  पांच सौ सवार और एक हजार पैदल सेना ले लेकर स्वयं दिल्ली की ओर अपने पुत्र सम्भाजी तथा अन्य दो विश्वास पात्र लोगों के साथ रवाना हुए। वे दिल्ली के निकट पहुंचे और दिल्ली से कुछ दुरी पर डेरा डाल दिया।

कुछ समय पश्चात् शिवाजी दिल्ली में घुसे। एक -एक करके जब उन्हें प्रचीन चिन्ह उन्हें दिखाये जाने लगे तब शिवाजी हिन्दुओं के प्रचीन गौरव के चित्र सामने दिखाई पड़ने लगे। उन्हें बार -बार हिन्दुओं के पतन से वेदना होने लगी।

औरंगजेब द्वारा छत्रपति शिवाजी का अपमान 

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)दरबार में घुसे और औरंगजेब को भेंट दी। औरंगजेब ने भेंट ग्रहण करके शिवाजी को पंचहजारी कर्मचारियों की श्रेणी में बैठने की आज्ञा दी इस अपमानपूर्ण व्यवहार से शिवाजी के क्रोध का ठिकाना न रहा ,पर वे समय विचार कर अपने को वश में कर केवल इतना ही बोले की क्या शिवाजी पंचहजारी ?

जब सम्राट महाराष्ट्र देश में जायेंगे तब देखेंगे कि शिवाजी के अधीन कितने पंचहजारी रह कर कैसे बल से खड्ग धारण करते हैं। उस समय औरंगजेब कुछ न बोला और दरबार भंग कर दिया।

औरंगजेब ने संदेश भेजा कि शिवाजी ने भरे दरबार में जो अपमानपूर्ण भाव प्रकट किया है उसका उन्हें यह दण्ड दिया जाता है कि अब भविष्य में राज दरबार में उन्हें स्थान न मिलेगा और आदेश दिया की शिवाजी के निवास स्थान पर पहरा रखा जाय। इस तरह शिवाजी दिल्ली में नज़रबन्द रखे गये।

परन्तु शिवाजी ने ऐसे संकट  काल में धैर्य से काम लिया और किसी तरह दिल्ली से भाग निकलने की योजना बनाने लगे और शिवाजी ने बीमारी का बहाना कर लिया और अपने साथ आए हुए सब सैनिकों को दक्षिण भेज दिया था।

मराठों को जब औरंगजेब के इस व्यवहार के बारे में पता चला तो उनकी क्रोध अग्नि भड़क उठी। मगर तानाजी ने उन्हें उस समय मुगलों से छेड़छाड़ करने से रोका ,क्योंकि उससे शिवाजी का प्राण हरण किये जाने का भय था।

तानाजी का दिल्ली आगमन

तानाजी दिल्ली पहुंच कर अपने 25 मावलों के साथ मुसलमानों की तरह शहर में रहने लगे। एक दिन दिल्ली भर में शिवाजी ने ढ़िढोरा पिटवा दिया किया कि अवस्था इतनी खराब हो गई है कि इस बीमारी से बचना कठिन है।

शाम के वक्त तानाजी हकीम के वेश में राजमहल के भीतर पहुंच कर शिवाजी को अपना असली वेश शिवाजी को दिखा कर उनके भाग निकलने के लिए जो योजना बनाई थी उसके बारे में सब कह सुनाया।

तानाजी के योजना के अनुसार शिवाजी ने एक दिन यह बात शहर में  फैला दी कि अब शिवाजी अच्छे हैं फिर उन्होंने दान पुण्य करना शुरू कर दिया और स्वस्थ होने के उपलक्ष्य में बड़ी बड़ी टोकरियों में मिठाइयां  भर-भर कर वे मन्दिरों और मस्जिदों में गरीबों को बांटने के लिए भेजने लगे। वे टोकरियां और खांचे कई कई आदमी उठा कर ले जाते थे।

कई दिन लगातार ऐसा होता रहा और वे एक दिन  अपनी सी आकृति वाले एक साथी को अपनी सोने की अंगूठी पहना कर लिटा दिया और स्वयं एक खांचे में मिठाइयों के बीच बैठ और दूसरे खांचे में अपने बेटे संभाजी को बैठा कर वे शहर से बाहर निकल गये और कशी पहुंचे जहा से बिहार ,पटना ,चांदा के रास्ते से वे दक्षिण पहुँच गये।

युद्ध आरंभ हुआ और धीरे धीरे खोये हुए सब किलों पर फिर छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)का अधिकार हो गया। राजा जयसिंह अब संसार में नहीं रहे थे इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज का रास्ता रोकने वाला कोई नहीं था। शिवाजी ने संधि के कारण जो  छोड़ा था  उसे फिर अपने अधिकार  में कर लिया।

सिंहगढ़  विजय 

छत्रपति शिवाजी महाराज(shivaji maharaj) की सारी जागीर में केवल दो ही आदमी बचे थे जो अब तक शिवाजी के वशीभूत नहीं हुए थे। चाकन के किलेदार और दूसरे थे सोपा जिले के  अध्यक्ष बाज़ी मोहिते।

इनमें से पहले सज्जन तो शिवाजी की बात समझ गए बाजी मोहिते  को अधीन करने की चिन्ता में थे तभी कोंडाने का किला शिवाजी के हाँथ आ गया। इसका किलेदार एक मुसलमान शासक था जिसने एक बड़ी रकम घूस में लेकर किले को शिवाजी को सौंप दिया।

यह किला अन्य किलों से बढ़ा और युद्ध के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थान था। इस दुर्ग में अंदर जाने के लिए कोई भी सीधा मार्ग नहीं था इसलिए शिवाजी ने इसका नाम सिंहगढ़ रखा।

इस किले के आने से छत्रपति शिवाजी को यह लाभ हुआ कि इसके आस पास जिन मावला जाति के लोगों की अधिकता थी वे अब पूर्ण रूप से शिवाजी के भक्त हो गये।

मावला जाति का सह्योग  

मावला जाति के लोग खेती किसानी का धंधा किया करते थे ,परन्तु उनके देश में कोई बाहरी शत्रु आक्रमण करता था तब ये एक होकर उनसे युद्ध किया करते थे। इनके आने से शिवाजी की सेना अधिक शक्तिशाली हो गई।

सोपा के बाजी मोहिते ने किसी प्रकार से शिवाजी की बात नहीं मानी ,उससे शिवाजी को बहुत बढ़ा विश्वास था ,क्योंकि वह उनकी सौतेली माँ का भाई था। जब मोहिते ने शाहजी की आज्ञा के बिना हिसाब चुकाने से साफ  इंकार कर दिया तब शिवाजी ने एक रात को अपने मावले वीरों सहित उसके ऊपर छापा मारा और मोहिते को उसके साथियों समेत कैद कर लिया।

उसके बाद राजा जयसिंह से संधि करने के समय से ही सिंहगढ़ मुगलों के हाँथ में चला गया था। और मेवाड़ से निकाला हुआ उदयभानु नामक सरदार इस किले की रक्षा में था।  उदयभानु ने किले के भीतर और बाहर बड़ा कड़ा पहरा बैठा दिया था।

सिंहगढ़ किला बढ़े दुर्गम स्थान पर था ,उदयभानु ने खास तौर पर उसकी रक्षा का प्रबंध किया था ,इसलिए उसे जीतना बहोत कठिन काम था। पर माता जीजा बाई शिवाजी से बार बार सिंहगढ़ लौटाने का आग्रह कर रही थीं।

तानाजी का सिंहगढ़ किले पर आक्रमण

इसके बाद शिवाजी के कहने पर  वीर तानाजी  एक हजार मावला वीरों के साथ सिंहगढ़ विजय करने के लिए निकल गए। साथ में उनके भाई सूर्यजी और शेलार मामा भी थे।  सभी  ने पाँच छः दिन तक किले के भेद लेने के पश्चात रात में दुर्ग पर कुछ योद्धाओं के साथ रस्सी के सहारे चढ़ कर  आगे बढ़े और जो शत्रु सामने आते गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

किले में भारी हलचल मच गई और घोर घमासान मच गया तब तानाजी के ऊपर उदयभानु ने हमला कर दिया दोनों के बीच भीषण तलवार चली और तानाजी उदयभानु की तलवार के शिकार हो गए यह सुनकर युद्ध करते हुए शेलार भी वहीं आ पहुंचे और उदयभानु को मृत्यु के घाट उतार दिया पर तानाजी गंभीर रूप से घायल होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

इस प्रकार तानाजी को खोकर सन 1670 की फाल्गुन कृष्णा नवमी को सिंहगढ़ पर शिवाजी का अधिकार हो गया। इसके पश्चात् वीर मराठों ने पुरंधर ,माहुली ,लोहगढ़ आदि दुर्गो पर अधिकार कर लिया।

शिवाजी विरुद्ध बीजापुर 

छत्रपति शिवाजी महाराज(shivaji maharaj) पूर्णरूप से सेना तैयार कर बीजापुर पर आक्रमण करना चाहते थे। मगर शुरआत में वो बीजापुर से आमने सामने की लड़ाई के लिए तैयार नहीं थे। यही सब सोचकर शिवाजी ने बीजापुर से सीधे युद्ध न कर  एक चाल  निकाली।

उन्होंने बीजापुर दरबार में अपने वकील भेजे कि जाकर नवाब को यह समझाए के तोरण दुर्ग पर शाहजी के पुत्र शिवाजी के अधिकार रहने से राज्य का ही लाभ है  उनके द्वारा  नवाब से यह भी निवेदन किया गया कि राज्य के ही लाभ के लिए मैंने किले पर अधिकार किया है।

नवाब ने वकीलों से  शिवाजी की दर्खास्त सुन तो ली लेकिन उसका ध्यान उस समय कर्नाटक की अराजकता की ओर लगा हुआ था और नवाब ने उत्तर देने में देर कर दी। लेकिन यह देरी शिवाजी की लिए बहोत हितकर सिद्ध हुई।

शिवाजी को जीते हुए किले से जो धन प्राप्त हुआ इससे इन्होंने बहुत से अस्त्र शस्त्र ख़रीद डाले और अपनी छोटी सेना में अधिक योद्धाओं की भर्ती करने लगे और उसी धन से उन्होंने तोरण से तीन मिल दूर पर महोबद पहाड़ी पर एक और दुर्ग बनवाया जिसका नाम रामगढ़ रखा जो अंत तक शिवाजी की राजधानी रहा।

बीजापुर के शासक ने युद्ध में अपने सेनापति अफजल खाँ को आक्रमण के लिए  भेजा तथा वह इस युद्ध में मारा गया इस युद्ध के पश्चात शिवाजी व बीजापुर के बीच संधि हुई।

पुरंदर की संधि

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)का राज्यभिषेक,  shivaji maharaj rajyabhishek

औरंगजेब ने शिवजी के दमन हेतु शाइस्ता खान को भेजा तथा शिवजी के गोरिल्ला युध्द नीति के कारण वह पराजित हुआ व दिल्ली वापस लौट गया। फिर औरंगजेब ने जयपुर के शासक राजा जयसिंह को दक्षिण शिवाजी  से युद्ध के लिए भेजा जिसके कारण राजा जयसिंह ने पुरंदर के किले को घेरा डाला।

अन्तः इसी वर्ष पुरंदर की संधि हुई जिसमे छत्रपति शिवाजी को मुगलों से छीना हुआ 23 किला मुगलों को वापस किया और शम्भाजी  को मुगल दरबार में भेजने की सहमति दी। जिसके पश्चात् जयसिंह से किए समझौते के तहत शिवाजी अगस्त 1666 में आगरा के किले में हुए। परन्तु औरंगजेब के द्वारा  उचित सम्मान न मिलने पर भरे दरबार में विश्वासघाती कहकर औरंगजेब का अपमान किया।

इसके पश्चात् शिवाजी और उनके साथियों को आगरा में स्थित  महल में कैद कर दिया परन्तु वे कुछ दिनों में गुप्त रूप से वहा से भागने में सफल हुए। एवं शिवाजी ने पुरंदर की संधि का उल्लंघन करते हुए सभी किलो को पुनः जीत लिए। इसी क्रम में शिवाजी ने 1670 में सिंहगढ़ का किला स्थापित किया था।

1674 में पंडित गंगाभट्टा द्वारा शिवाजी का राज्यभिषेक हुआ तथा शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की

छत्रपति शिवाजी महाराज का शासन व्यवस्था

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)की शासन व्यवस्था बहुत ही अच्छा था। ऐसी शासन व्यवस्था उन्होंने कर कर रखी थी। वैसी व्यवस्था मुग़ल साम्राज्य में भी नहीं थी।

शिवाजी का राज्य दो भागो में बंटा हुआ था। एक पहाड़ी दुर्ग था जिनकी व्यवस्था एक विशेष तरह से होता था। और दूसरा मैदानी तथा महलों में बंटा हुआ था। जो शिवजिया कहलाता था जहाँ केवल चौथ से संबध रखा  जाता था।

शिवाजी ने राज्य की व्यवस्था के लिए इनका प्रबंध आठ भागों में बाँट रखा था। प्रत्येक विभाग का प्रधान उनकी राजयसभा  सदस्य  होता था। राज्य सभा की अनुमति के बिना राज्य का कोई कार्य नहीं होता था। विभाग के प्रधान की उपाधि भी अलग-अलग होता था।

  • पेशवा – यह प्रधान राजमंत्री की उपाधि  होता था। यह पदधिकारी राज सिंहासन के नीचे दायी ओर पहले जगह रखता था।
  • सेनापति – ये सेना के प्रधान थे। और सिंहासन  बायी ओर बैठते थे।
  • पंत सचिव – इनका काम कोष निरिक्षण का होता था।
  • पंत अमात्य – ये कोषाध्यक्ष होते थे जो पेशवा के बाद बैठते थे।
  •  मंत्री –  महाराज के निजी सलाहकार होते थे।
  •  सीमांत – ये विदेश सचिव होते थे।
  •  राव – ये न्याय शास्त्री कहे जाते थे। इनका काम शास्त्रों से व्यवस्था देने का था।
  •  न्यायधीश – ये प्रधान न्यायध्यक्ष होते थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)को अपने  किलों का पूरा ध्यान  था।  प्रत्येक किला एक मराठा हवलदार   के अधीन रहता था।   और इसके नीचे की दीवार के हर एक हिस्से के नाम से सहायक होते थे। जिनके ऊपर प्रत्येक दीवार की रक्षा का भार होता था। प्रत्येक किले में ब्राह्मणों को धन और आय व्यय संबंधी काम के लिए रखा जाता था।

पैदल सेना में दस सिपाहियों के ऊपर एक हवलदार  रखा जाता था। दो हवलदारों का एक अफसर एक जुमलेदार होता था। और एक हजार सिपाहियों के ऊपर एक हजारी होता था। सात हजार सिपाहियों का अध्यक्ष सरनोवत  कहलाता था।

शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र 

छत्रपति शिवाजी महाराज(shivaji maharaj)वीर ,तपस्वी ,साहसी ,ब्राह्मणों और संपूर्ण हिन्दू जाति को बचाया उनकी वीरता ने मयूर सिंहासन तक को हिला दिया था। उदारता की वो तो मूर्ति थे।  यहाँ तक कि एक बार उन्होंने अपना सम्पूर्ण  राज्य अपने गुरू को दान कर दिया था,किन्तु गुरु ने उनको अपना प्रतिनिधि बनाकर राज्य सौंप दिया था।

उनका चरित्र एकदम निर्मल और दोष हीन था।  वे मुग़ल शासकों के शत्रु थे उनके अत्याचारों का बदला चुकाने तथा हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने जीवन भर उनको पराजित किया।परन्तु चरित्र के वे बड़े पक्के थे।

अपने शासन काल में न जाने कितनी बार शत्रु की स्त्री उनके हाथों पड़ी ,लेकिन उनके साथ उन्होंने सदा अपनी सगी बहन सा बर्ताव किया था। 

छत्रपति शिवाजी का औरतों के प्रति व्यवहार  

एक बार की बात है जब मराठों ने कल्याण दुर्ग पर अधिकार कर लिया तब नीलपंत ने दुर्ग के अध्यक्ष की रूपवती कन्या को बंदी कर लिया। उसे लेकर वे शिवाजी के पास पहुँचे और कहा की यह मौलाना की कन्या हैं ,मै इसे महाराज  के लिए लाया हूँ।

शिवाजी उन पर नाराज हो गए और बोले की हमारा यह धर्म नहीं कि पर स्त्री पर अत्याचार करें,यदि हम पर स्त्री ग्रहण करने लगे तो राज्य कार्य नहीं कर सकते। यह कह उसे उसके घर भिजवा दिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)मुगलों के शत्रु तो थे ,पर उनके धर्म की निन्दा नहीं करते थे। उनकी आज्ञा थी की कोई आदमी किसी मस्जिद को नुकसान न पहुँचाये और न दीन-इस्लाम की हँसी उड़ाये। वे लूट के समय वे गरीबों और किसानों को हानी नहीं पहुंचाते थे। अपने आदमियों से सदा प्रेम का बर्ताव करते थे। शत्रुओं को वश में करने के कार्य में दक्ष थे।

ऐसे महान पुरुष के जीवन चरित्र का अनुसरण भारत के प्रत्येक युवा को करना चाहिए और छत्रपति शिवाजी का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है ।

शिवाजी महाराज की मृत्यु कैसे हुई

छत्रपति शिवाजी महाराज (shivaji maharaj)का अंतिम सैन्य अभियान सिंधियो के खिलाफ  1677 में था। वे जंजीरा और गोवा पर कब्ज़ा नहीं कर सके तथा कुछ वर्षो  पश्चात शिवाजी की  मृत्यु 1680 में हो गई

Leave a Comment