राणा सांगा का इतिहास

राणा सांगा अपने समय के सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे । वह एक कुशल राजनीतिज्ञ और साहसी राजा थे । खानवा के युद्ध में  उनके शरीर पर 80 घाव लगे थे। उनका एक हाँथ युद्ध में कट गया था और एक आँख पहले से नहीं था इसके बावजूद वो पुरे दिन युद्ध करते थे । इतने शक्तिशाली योद्धा थे राणा सांगा।

राणा सांगा का परिचय, Rana Sanga History In Hindi

उनका जन्म 12 अप्रैल 1472 को चित्तौढग़ढ़ में हुआ था । इनके पिता का नाम राणा रायमल था ।राणा रायमल की पाँच संताने थी । राणा सांगा( संग्राम सिंह ), पृथ्वीराज और जयमल नाम के तीन लड़के और दो पुत्री थी । सांगा की माता का नाम रानी रतनकंवर था । उसकी एक लड़की का विवाह गिरनार के यदुवंशी राजा शूरजी से हुआ और दूसरी लड़की का विवाह सिरोही के देवड़ा राज्य के जैमल के साथ हुआ था।

 राणा-सांगा

राणा रायमल के तीनों पुत्र शुरू से तेजस्वी और अत्यंत शूरवीर थे । इन तीनों में राणा सांगा और पृथ्वी राज के नाम बहुत प्रसिद्ध थे । बल और पराक्रम में तीनों निपुण थे ।

परन्तु कम उम्र में ही तीनों आपस में लड़ने लगे थे । बड़े होने के साथ साथ उनके झगड़े भी बढ़ते चले गए। राणा सांगा और पृथ्वीराज  दोनों की एक ही माता थी । जयमल उनका सौतेला भाई था ।

तीनों भाइयों में कोई अंतर नहीं था । राणा रायमल अपने तीनों पुत्र को एक सामान ही प्रेम करते थे । तीनों बालक बड़े होनहार होने के कारण राणा रायमल बड़े ही प्रसन्न थे । पर इनके झगड़े के कारण वो बहुत चिंतित हो गए ।

इन झगड़ों के क्या कारण है,राणा को समझ में नहीं आया । समझाने के बाद भी इनके आपसी झगड़ों में कोई कमी नहीं आया ।

इस कारण राणा रायमल ने अपने तीनों पुत्रों को राज्य से निकाल देने का विचार किया । उन तीनों में सबसे बड़ा पृथ्वीराज था और राणा का पहला पुत्र था और वही राणा का उत्तराधिकारी था ।

तीनों अपने आप को राज्य का उत्तराधिकारी समझते थे ।

चरणी माता की भविष्यवाणी

चरणी माता मेवाड़ में इष्ट देवी के रूप में मानी जाती थी । लोगों का मानना था की चरणी माता अपनी पुजारिन के माध्यम से सच्ची भविष्यवाणी करती है ।

राजपरिवार से सबंधित भविष्यवाणी के लिए चरणी माता हर समय उपस्थित हो जाती थी । कुँवर पृथ्वीराज और संग्राम सिंह चरणी माता के मंदिर गए थे ।

चरणी माता ने दोनों से कहा – कुमारों चिंता त्याग दो, तुम्हारा भविष्य उज्जवल है । मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारें साथ है । न कोई गृह, कोई नक्षत्र, न उल्का, न पिंड और न शत्रु , न मित्र इस राजकुमार का कोई अनिष्ट नहीं कर सकता, उन्नति और विस्तार ही इसका भविष्य है ।

पर कुँवर पृथ्वीराज को मेवाड़ के उत्तराधिकारी के बारे में जानना था। तब पृथ्वीराज ने माता से पूछा मेवाड़ का भावी शासक कौन होगा , इतने में पुजारिन में हाँथ कुँवर संग्राम सिंह के सर पर टिके तो पृथ्वीराज सन्नाटे में आ गया और यह देखकर क्रोधित हो गया ।

और कुँवर पृथ्वीराज ने क्रोध में तमतमाकर म्यान से तलवार निकाल लिया और संग्राम सिंह ( राणा सांगा ) पर तलवार चला दिया।  दोनों ही राणकुशल थे और दोनों में भयंकर तलवारबाजी होने लगा। तथा सूरजमल ने इनके लड़ाई को शांत करवाया ।

पृथ्वीराज का सांगा पर हमला

एक बार कुँवर पृथ्वीराज और सांगा वन भ्रमण के लिए जा रहे थे, इस समय इनके साथ कोई सैनिक साथ में नहीं थे । पृथ्वीराज ने वन में सांगा पर हमला कर दिया और सांगा की आँख में तलवार की नोक घोप दी, जिससे संग्राम सिंह तड़प उठा और आँख से रक्त की धारा बहने लगी।

सांगा ने एक मुट्ठी रेत पृथ्वी के आँखों में फेंका और वहाँ से जान बचाकर भाग निकला । जंगल के दक्षिण छोर पर सेवंतरी गांव था, और वहाँ के मंदिर के पास भागते- भागते सांगा पहुंचे तथा उस मंदिर में उस दिन दर्शन करने मारवाड़ के राठौड़ बींदा जैतमलोट सपरिवार आये हुए थे ।

बींदा ने सांगा को अपने शिविर में ले गया,कुछ समय के बाद राणा सांगा वहाँ से सुरक्षित जाने लगे तभी कुँवर जयमल भी वँहा पहुँच गया, बींदा राठौड़ ने अपनी पत्नी की मदद से सांगा को घोड़े में बिठाकर वहाँ से विदा कर दिया ।

बींदा और जयमल के बीच युद्ध हुआ, जब वह लौटकर आई तो देखा की बींदा बुरी तरह से घायल हो गया है, जिसमे बींदा राठौड़ शहीद हो गए ।

उधर भागते हुए सांगा ने सोंचा की भाइयों से लड़ियों में जीवन बीता दिया तो जीवन व्यर्थ हो जायेगा । सांगा ने अपना घोड़ा घने जंगलों की ओर मोड़ दिया । उसने फैसला कर लिया की वह लौटकर मेवाड़ नहीं जायेगा ।

राणा सांगा का कर्मचंद डाँकू से मुलाक़ात

छिपते- छिपाते राणा सांगा जंगल में गड़रियों से मिला। और उन्हीं के यँहा खाना पकाने और भेड़ बकरियों को चराने का काम करने लगे ।

कभी काम ठीक से नहीं होने पर गड़रिये उसे नौकर समझकर गाली- गलौज करने लगते थे । दुखी सांगा एक दिन जंगल में भेड़ बकरियाँ चराते समय हथियार बंद घुड़सवार दिखाई दिए।

सांगा को देखकर उन्होंने उसे अपने साथ ले गए और उनके प्रमुख कर्मचंद ने सांगा को अपने यहाँ काम पर रख लिया ।

कर्मचंद की बेटी को संग्राम सिंह भा गया । दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे,  और सांगा ने उस से विवाह करके, लूटमार के धंधे को छोड़कर कहीं और घर बसाने के लिए कहा ।

राणा सांगा का विवाह

कर्मचंद के एक डांकू साथी ने यह बात सुन लिया और जाकर सरदार से कह दिया । कर्मचंद आग बबूला हो गया और उस पर नज़र रखने लगा ।

राणा सांगा
राणा सांगा

एक दिन राणा सांगा एक पेड़ के नीचे सो रहा था, और सांगा के सिर पर धूप पड़ने लगा तभी एक बड़ा नाग आया और सांगा के किनारे बैठ गया और अपने फन से धूप से बचाने लगा

जो डांकू उसकी जासूसी कर रहा था, वह डर गया और जाकर कर्मचंद को बताया। कर्मचंद ने खुद आकर देखा तो वह समझ गया की वह कोई साधारण राजपूत नहीं है ।

अगले दिन कर्मचंद पंवार ने संग्राम सिंह को बुलाकर कहा क्या तुम मेरी बेटी से प्रेम करते हो । संग्राम सिंह ने कहाँ हाँ और आपकी बेटी भी मुझसे प्रेम करती है ।

जंगल में ही संग्राम सिंह( राणा सांगा) का विवाह हो गया । इसके बाद संग्राम सिंह ने रहस्य खोला और कहाँ, मैं राणा रायमल का पुत्र हूँ और सांगा के नाम से जाना जाता हूँ ।

सांगा का राज्याभिषेक

5 मई सन 1509 में रायमल की मृत्यु के बाद राणा संग्राम सिंह( राणा सांगा ) 27 वर्ष की उम्र में मेवाड़ के राजा बने । राणा सांगा के समय उनके राज्य की स्थिति ठीक नहीं था । राणा रायमल के समय राज्य की स्थिति ठीक नहीं था ।

चारों ओर आराजकता फैला हुआ था । मारवाड़ के राठौड़ों ने अपनी शक्ति का विस्तार कर लिया था । राणा कुंभा की मृत्यु के बाद उदा ने आबू, सिरोही, तारागढ़ और साभंर इलाके को खो दिए । राणा रायमल उन इलाकों को वापस नहीं ले पाया ।

राणा सांगा प्रारम्भ से ही एक लक्ष्य लेकर चलता चला । उसने ठान लिया था कि उसे महाराणा कुंभा से बड़ा राज्य स्थापित करना है और विदेशियों को भारत से खदेड़ देना है ।

इसके लिए उसने अपने सहयोगी को उच्च पद दिए और विशवास पात्र सामंतों की जागीरों में वृद्धि की । उसने कर्मचंद को अजमेर में नियुक्त किया और बेटे जगमल को राव की उपाधि दिया।

सांगा ने अपने राज्य विस्तार कि लिए राजवंशी विवाह करके अपने राज्य का की सीमा को बढ़ाने लगा। जिसमें से सांगा ने मारवाड़ कि राव गंगा की बहन से विवाह किया । आमेर के राजा पृथ्वीराज की बहन से विवाह किया । इस प्रकार राजपूत राजाओं से सांगा के मधुर संबंध बन गए ।

मेवाड़ सदा से ही अपने शत्रुओं से घिरा रहता था । एक ओर गुजरात दूसरी ओर मालवा और तीसरी ओर मालवा था । और पश्चिम से विदेशी आक्रमणकारी आते रहते थे।

राणा सांगा और बाबर का युद्ध

बाबर ने इब्राहिम लोदी को मारकर दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था । और उसने वहाँ एक वर्ष तक विश्राम किया। और एक वर्ष तक उसने भारतवर्ष के राजाओं का अध्ध्यन किया ।

बाबर 1500 की सेना लेकर आगरा और सीकरी से रवाना हुआ । यह समाचार पाते ही राणा सांगा ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दिया । राजस्थान के सभी राजा और मेवाड़ के सभी सामंत अपनी सेना लेकर चित्तौढ़ पहुँच गए ।

खानवा का युद्ध (khanwa ka yudh)

कार्तिक महीने की पंचमी संवत 1584 सन 1528 ई को राजपूत सेना ने बयाना पँहुच कर बाबर की सेना का रास्ता रोका और खानवा के मैदान में राणा सांगा की सेना ने बाबर की फ़ौज पर हमला कर दिया ।

दोनों ओर से संग्राम आरम्भ हुआ गया . राजपूतों की सेना ने बाबर की सभी सेना काट डाली। और बाबर घबरा गया । उसी समय उसकी सहायता के लिए दूसरी सेना आ पहुंची। राजपूतों के साथ इन्होंने युद्ध किया और बहुत सारे बाबर के सैनिक फिर मारे गए । यह देख बाबर वहाँ से भाग निकला ।

राजपूतों की सेना ने बाबर को बुरी तरह पराजित किया । उसने डर के कारण अपने शिवर के आस- पास गहरे खाइयाँ दी और किनारे पर शत्रुओं को रोकने के लिए तोपे लगवा दिया था ।

राजपूतों से बुरी तरह पराजित होने पर बाबर की सेना का साहस बिलकुल टूट गया था । उसने कई प्रयत्न किये मगर अपनी सेना का मनोबल नहीं बढ़ा सका। इसके बाद बाबर ने अपने सैनिकों से कहा – तुम सब लोग कुरान को अपने हाथ में लेकर इस बात अहद करों की इस लड़ाई में हम या तो फतह करेंगे या अपने आप को कुर्बान कर देंगे।

इस कारण बाबर के सभी सैनिक तैयार हो गए ।  बाबर की सेना ने फिर आक्रमण किया और बुरी तरह पराजित हुआ और वहाँ से भाग गया । बाबर की इस दुर्बलता का राणा सांगा ने कोई लाभ नहीं उठाया और राजपूतों की  सेना चित्तौढ़ चले गए ।अगर उसी समय बाबर पर हमला कर उसे आसानी से हराया जा सकता था और बाबर को हमेशा के लिए  भारत से खदेड़ा जा सकता था ।

बाबर ने युद्ध बंद करके राजपूतों को जीतने के लिए कई सारी योजना बनाया पर सफल नहीं हुआ । अंत में उसने राणा सांगा से संधि करना चाहा और अपना दूत भेजा । संधि के अनुसार दिल्ली और उसकी अधीनता के सभी इलाके बाबर के अधिकार में होंगे और बयाना के पास बहने वाली पीली नदी मुंगल और मेवाड़ राज्य की सीमा समझा जाएगा ।

और मुंगल बादशाह बाबर एक निश्चित रकम राणा को देगा । और बाबर ने संधि को स्वीकार कर लिया था । लेकिन शिलादित्य के परामर्श के अनुसार  सांगा ने इस संधि को अस्वीकार कर दिया ।

राणा सांगा के साथ विश्वासघात 

16 मार्च को दोनों की सेनाओं का सामना हुआ और भयंकर युद्ध हुआ । इस बार युद्ध में राजपूत अधिक मारे गए । जिन शूरवीरों सरदारों पर सांगा का अधिक विश्वाश था वो सभी मारे गए थे । इसके बाद भी युद्ध के हालत राणा सांगा के पक्ष में था ।

मार काट दोनों ओर से भीषण होता जा रहा था । इस भयानक समय में मेवाड़ राज्य का सामंत शिलादित्य जिसके परामर्श से राणा ने को अस्वीकार कर दिया था, अपनी पूरी सेना लेकर बाबर के साथ मिल गया। उसके इस देशद्रोह और विश्वासघात के कारण युद्ध की परिस्थिति बदल गयी । और थोड़े ही समय में राजपूतों का भयानक संहार हुआ ।

राणा सांगा के शरीर में भयानक घाव आये और उसने अपनी बची हुई सेना को लेकर मेवाड़ के लिए निकल गए राणा सांगा ने जाते हुए कहा – ” में चित्तौढ़ में लौटकर उस समय तक नहीं आऊंगा, जब तक मई मुंगल बादशाह को पराजित न कर लूंगा । बाबर के साथ अंतिम युद्ध में राणा सांगा पराजित हो गए ।

राणा सांगा की मृत्यु

युद्ध के बाद राणा सांगा मेवाड़ के पर्वत पर चले गए, 30 जनवरी 1528 को बसवा नामक स्थान पर राणा सांगा की मृत्यु हो गई । ऐसा माना जाता है की उनके मंत्रियों ने ही उन्हें जहर देकर मार डाला था ।  संग्राम सिंह के मरने  पर पूरे राजस्थान में शोक मनाया गया था .यदि राणा जीवित रहते तो अपनी प्रतिज्ञा को अवश्य पूर्ण कर लेते पर भगवान को यह स्वीकार न था ।

राणा सांगा अत्यंत साहसी और धैर्यवान था । पराजित शत्रु पर वह सदा रहम करता था,उसके साथ अपनी उदारता का परिचय देता था । उसके इन अच्छे गुणों की प्रसंशा बाबर ने स्वयं अपने संस्मरण में किया है ।

राणा सांगा के मृत्यु के बाद राज्य में सभी रानियाँ अपने पुत्र को राज्य सिंहासन पर बैठाने की कोशिश करते रहे । एक रानी ने अपने लड़के को राजा बनाने के लिए बाबर से संधि तक कर लिया था । इस संधि में उसने रणथम्भौर का दुर्ग और विजय में पाए मालवा राज्य के बादशाह का ताज भी बाबर को देना तय कर दिया था ।

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